श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 1: राजा सुद्युम्न का स्त्री बनना  »  श्लोक 26

 
श्लोक
तस्मिन् प्रविष्ट एवासौ सुद्युम्न: परवीरहा ।
अपश्यत् स्रियमात्मानमश्वं च वडवां नृप ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मिन्—उस वन में; प्रविष्ट:—प्रविष्ट होने पर; एव—निस्सन्देह; असौ—वह; सुद्युम्न:—राजकुमार सुद्युम्न; पर-वीर-हा—अपने शत्रुओं को दमन करने वाले; अपश्यत्—देखा; स्त्रियम्—स्त्री; आत्मानम्—अपनेआपको; अश्वम् च—तथा अपने घोड़े को; वडवाम्—घोड़ी में; नृप—हे राजा परीक्षित ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा परीक्षित, ज्यों ही अपने शत्रुओं को दमन करने में निपुण सुद्युम्न उस जंगल में प्रविष्ट हुआ त्यों ही उसने देखा कि वह एक स्त्री में और उसका घोड़ा एक घोड़ी में परिणत हो गया है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥