श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 1: राजा सुद्युम्न का स्त्री बनना  »  श्लोक 32

 
श्लोक
तदिदं भगवानाह प्रियाया: प्रियकाम्यया ।
स्थानं य: प्रविशेदेतत् स वै योषिद् भवेदिति ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—क्योंकि; इदम्—यह; भगवान्—शिवजी ने; आह—कहा; प्रियाया:—अपनी प्रिय पत्नी के; प्रिय-काम्यया—आनन्द के लिए; स्थानम्—स्थान; य:—जो कोई; प्रविशेत्—प्रवेश करेगा; एतत्—यहाँ; स:—वह व्यक्ति; वै—निस्सन्देह; योषित्—स्त्री; भवेत्—हो जायेगा; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् अपनी पत्नी को प्रसन्न करने के लिए शिवजी ने कहा, “इस स्थान में प्रवेश करते ही पुरुष तुरन्त स्त्री बन जायेगा।”
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥