श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 1: राजा सुद्युम्न का स्त्री बनना  »  श्लोक 33

 
श्लोक
तत ऊर्ध्वं वनं तद् वै पुरुषा वर्जयन्ति हि ।
सा चानुचरसंयुक्ता विचचार वनाद् वनम् ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
तत: ऊर्ध्वम्—उस समय के बाद से; वनम्—जंगल में; तत्—उस; वै—विशेष रूप से; पुरुषा:—पुरुष-गण; वर्जयन्ति—नहीं प्रवेश करते; हि—निस्सन्देह; सा—स्त्री रूप में सुद्युम्न; च—भी; अनुचर-संयुक्ता—अपने साथियों के साथ; विचचार—घूमने गया; वनात् वनम्—एक जंगल से दूसरे में ।.
 
अनुवाद
 
 उस काल से कोई भी पुरुष उस जंगल में नहीं घुसा। किन्तु अब स्त्री रूप में परिणत होकर राजा सुद्युम्न अपने साथियों समेत एक जंगल से दूसरे जंगल में घूमने लगा।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (२.२२) में कहा गया है—
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्य- न्यानि संयाति नवानि देही ॥

“जिस प्रकार मनुष्य अपने पुराने वस्त्रों को त्यागकर नये वस्त्र धारण करता है उसी प्रकार आत्मा पुराने तथा व्यर्थ के शरीरों को त्यागकर नवीन देहें धारण करता है।”

यह शरीर वस्त्र की भाँति है और यहाँ पर इसे सिद्ध किया गया है। सुद्युम्न तथा उसके साथी नर (पुरुष) थे जिसका अर्थ है कि उनकी आत्माएँ नर वस्त्र से ढकी थीं, किन्तु अब वे स्त्रियाँ हो गई थीं जिसका अर्थ है कि उनका वस्त्र बदला था, किन्तु आत्मा वही रही। कहा जाता है कि आधुनिक चिकित्सा से नर को नारी में और नारी को नर में परिणत किया जा सकता है। किन्तु शरीर का आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं रहता। शरीर तो इसी जीवन में या अगले जीवन में बदला जा सकता है। अतएव जिस व्यक्ति को आत्मा का और एक शरीर से दूसरे शरीर में आत्मा के देहान्तरण का ज्ञान है वह वस्त्ररूपी शरीर के प्रति कोई ध्यान नहीं देता। पण्डिता: समदर्शिन:। ऐसा व्यक्ति परमात्मा के अंश स्वरूप आत्मा का दर्शन करता है। इसीलिए वह समदर्शी अर्थात् विद्वान व्यक्ति है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥