श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 1: राजा सुद्युम्न का स्त्री बनना  »  श्लोक 4

 
श्लोक
तेषां वंशं पृथग् ब्रह्मन् वंशानुचरितानि च ।
कीर्तयस्व महाभाग नित्यं शुश्रूषतां हि न: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
तेषाम्—उन सारे राजाओं के; वंशम्—वंश को; पृथक्—अलग-अलग; ब्रह्मन्—हे महान् ब्राह्मण (शुकदेव गोस्वामी); वंश- अनुचरितानि च—तथा उनके वंश एवं गुण; कीर्तयस्व—कृपया कहिये; महा-भाग—हे परम भाग्यशाली; नित्यम्—नित्य; शुश्रूषताम्—आपकी सेवा में लगे हुओं का; हि—निस्सन्देह; न:—हम सबका ।.
 
अनुवाद
 
 हे परम भाग्यशाली शुकदेव गोस्वामी, हे महान् ब्राह्मण, कृपा करके हम सबको उन सारे राजाओं के वंशों तथा गुणों का पृथक्-पृथक् वर्णन कीजिये क्योंकि हम आपसे ऐसे विषयों को सुनने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥