श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 10: परम भगवान् रामचन्द्र की लीलाएँ  »  श्लोक 28

 
श्लोक
कृतैषा विधवा लङ्का वयं च कुलनन्दन ।
देह: कृतोऽन्नं गृध्राणामात्मा नरकहेतवे ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
कृता—तुम्हारे द्वारा की गई; एषा—इस समस्त; विधवा—संरक्षकविहीन; लङ्का—लंका-राज्य; वयम् च—हमें भी; कुल-नन्दन—हे राक्षसों के आनन्द; देह:—शरीर; कृत:—तुम्हारे द्वारा बनाई गई; अन्नम्—खाद्य पदार्थ; गृध्राणाम्—गीधों का; आत्मा—तथा तुम्हारी आत्मा; नरक-हेतवे—नरक जाने के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 हे राक्षसकुल के हर्ष, तुम्हारे ही कारण अब लंका-राज्य तथा हम सबों का भी कोई संरक्षक नहीं रहा। तुमने अपने कृत्यों के ही कारण अपने शरीर को गीधों का आहार और अपनी आत्मा को नरक जाने का पात्र बना दिया है।
 
तात्पर्य
 जो भी रावण के मार्ग पर चलता है उसकी भर्त्सना दो प्रकार से की जाती है—उसका शरीर कुत्तों तथा गीधों के खाने योग्य रहता है तथा उसकी आत्मा नरक में जाती है। जैसा कि स्वयं भगवान् ने भगवद्गीता (१६.१९) में कहा है—
तानहं द्विषत: क्रूरान् संसारेषु नराधमान्।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥

“जो लोग ईर्ष्यालु तथा शैतान हैं, जो मनुष्यों में सबसे नीच हैं उन्हें मैं भवसागर में विविध राक्षस योनियों में डालता हूँ।” इस तरह रावण, हिरण्यकशिपु, कंस तथा दंतवक्र जैसे नास्तिकों की गति नारकीय जीवन में है। रावण की पत्नी मन्दोदरी सती होने के कारण सब कुछ जानती थी। यद्यपि वह अपने पति की मृत्यु पर विलाप कर रही थी, किन्तु वह जानती थी कि उसके शरीर और आत्मा का क्या होगा क्योंकि भले ही हमें भौतिक आँखों से यह न दिखे, किन्तु ज्ञान की आँखों से देखा जा सकता है (पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष: )। वैदिक इतिहास में ऐसे कितने ही उदाहरण हैं जिनमें मनुष्य के ईश्वरविहीन होने पर प्रकृति के नियमों द्वारा भर्त्सित होना पड़ता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥