श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 10: परम भगवान् रामचन्द्र की लीलाएँ  »  श्लोक 9

 
श्लोक
रक्ष:स्वसुर्व्यकृत रूपमशुद्धबुद्धे-
स्तस्या: खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् ।
जघ्ने चतुर्दशसहस्रमपारणीय-
कोदण्डपाणिरटमान उवास कृच्छ्रम् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
रक्ष:-स्वसु:—राक्षस (रावण) की बहन, शूर्पणखा के; व्यकृत—(राम द्वारा) कुरूप किये जाने पर; रूपम्—स्वरूप, मुख; अशुद्ध बुद्धे:—क्योंकि कामवासना के कारण उसकी बुद्धि दूषित हो चुकी थी; तस्या:—उसके; खर-त्रिशिर-दूषण-मुख्य-बन्धून्—खर, त्रिशिर, दूषण इत्यादि अनेक दोस्तों को; जघ्ने—(भगवान् राम ने) मारा; चतुर्दश-सहस्रम्—चौदह हजार; अपारणीय—अकल्पनीय; कोदण्ड—धुनष-बाण; पाणि:—अपने हाथ में; अटमान:—जंगल में घूमते हुए; उवास—वहाँ निवास किया; कृच्छ्रम्—बड़ी कठिनाई से ।.
 
अनुवाद
 
 जंगल में घूमते हुए, वहाँ पर अनेक कठिनाइयों को झेलते तथा अपने हाथ में महान् धनुष-बाण लिए भगवान् रामचन्द्र ने कामवासना से दूषित रावण की बहन के नाक-कान काटकर उसे कुरूप कर दिया। उन्होंने उसके चौदह हजार मित्रों को भी मार डाला जिनमें खर, त्रिशिर तथा दूषण मुख्य थे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥