श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 11: भगवान् रामचन्द्र का विश्व पर राज्य करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
मुनौ निक्षिप्य तनयौ सीता भर्त्रा विवासिता ।
ध्यायन्ती रामचरणौ विवरं प्रविवेश ह ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
मुनौ—वाल्मीकि मुनि को; निक्षिप्य—सौंप कर; तनयौ—लव तथा कुश दोनों पुत्र; सीता—सीतादेवी; भर्त्रा—अपने पति द्वारा; विवासिता—वनवास दी गई; ध्यायन्ती—ध्यान करती; राम-चरणौ—भगवान् राम के चरणकमल; विवरम्—पृथ्वी के भीतर; प्रविवेश—प्रवेश कर गई; ह—निस्सन्देह ।.
 
अनुवाद
 
 अपने पति द्वारा परित्यक्ता सीतादेवी ने अपने दोनों पुत्रों को वाल्मीकि मुनि की देखरेख में छोड़ दिया। तत्पश्चात् भगवान् रामचन्द्र के चरणकमलों का ध्यान करती हुईं वे पृथ्वी में प्रविष्ट हो गईं।
 
तात्पर्य
 सीतादेवी के लिए रामचन्द्र से बिछुड़ कर रह पाना असम्भव था। अतएव वे अपने दोनों पुत्रों को वाल्मीकि मुनि के संरक्षण में छोडक़र पृथ्वी में समा गईं।
 
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