श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 11: भगवान् रामचन्द्र का विश्व पर राज्य करना  »  श्लोक 18

 
श्लोक
तत ऊर्ध्वं ब्रह्मचर्यं धार्यन्नजुहोत् प्रभु: ।
त्रयोदशाब्दसाहस्रमग्निहोत्रमखण्डितम् ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; ऊर्ध्वम्—सीता द्वारा पृथ्वी में प्रविष्ट होन के बाद; ब्रह्मचर्यम्—पूर्ण ब्रह्मचर्य; धारयन्—धारण करते हुए; अजुहोत्— यज्ञ किये; प्रभु:—भगवान् रामचन्द्र ने; त्रयोदश-अब्द-साहस्रम्—तेरह हजार वर्षों तक; अग्निहोत्रम्—अग्निहोत्र यज्ञ; अखण्डितम्— अनवरत ।.
 
अनुवाद
 
 सीता द्वारा पृथ्वी में प्रवेश करने के बाद भगवान् रामचन्द्र ने पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन किया और तेरह हजार वर्षों तक वे अनवरत अग्निहोत्र यज्ञ करते रहे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥