श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 11: भगवान् रामचन्द्र का विश्व पर राज्य करना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
स यै: स्पृष्टोऽभिद‍ृष्टो वा संविष्टोऽनुगतोऽपि वा ।
कोसलास्ते ययु: स्थानं यत्र गच्छन्ति योगिन: ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वे, भगवान् रामचन्द्र; यै:—जिन पुरुषों के द्वारा; स्पृष्ट:—स्पर्श किया गया; अभिदृष्ट:—देखा गया; वा—या तो; संविष्ट:—साथ भोजन और शयन करते हुए; अनुगत:—नौकरों की भाँति पीछे-पीछे चलते हुए; अपि वा—भी; कोसला:—कोसलवासी; ते—वे; ययु:—चले गये; स्थानम्—स्थान को; यत्र—जहाँ; गच्छन्ति—जाते हैं; योगिन:—सारे भक्तियोगी ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् रामचन्द्र अपने धाम को लौट आये जहाँ भक्तियोगी जाते हैं। यही वह स्थान है जहाँ अयोध्या के सारे निवासी भगवान् को उनकी प्रकट लीलाओं में नमस्कार करके, उनके चरणकमलों का स्पर्श करके, उन्हें पितृतुल्य राजा मानकर, उनकी बराबरी में बैठकर या लेटकर या मात्र उनके साथ रहकर, उनकी सेवा करने के बाद वापस गये।
 
तात्पर्य
 भगवान् भगवद्गीता (४.९) कहते हैं—

जन्म कर्म च मे दिव्यम् एवं यो वेत्ति तत्त्वत:।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥

“जो मेरे प्राकट्य की दिव्य प्रकति तथा मेरे कार्यकलापों को जानता है वह इस शरीर को त्यागने के बाद इस भौतिक जगत में फिर से जन्म नहीं लेता अपितु हे अर्जुन! वह मेरे नित्य धाम को प्राप्त होता है।” यहाँ इसकी पुष्टि हुई है। अयोध्या के सारे निवासी, जिन्होंने प्रजा के रूप में भगवान् रामचन्द्र का दर्शन किया, दास रूप में उनकी सेवा की, उनके साथ मित्र या अन्य रूप में बैठे-बोले या उनके शासनकाल में उपस्थित थे वे सभी भगवद्धाम वापस गये। जिस भक्त की भक्ति पूर्ण होती है वह इस शरीर को त्यागकर उस विशेष ब्रह्माण्ड में प्रवेश करता है जहाँ भगवान् रामचन्द्र या भगवान् कृष्ण अपनी लीलाओं में व्यस्त रहते हैं। तब उस प्रकट लीला में विभिन्न पदों पर रहकर भगवान् की सेवा करना सीखकर भक्त अन्त में सनातन धाम पहुँचता है। भगवद्गीता में इस सनातन धाम का भी उल्लेख मिलता है (परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात् सनातन: )। जो भगवान् की नित्य लीलाओं में प्रवेश पा जाता है वह नित्य लीला-प्रविष्ट कहलाता है। यह स्पष्ट तौर पर समझने के लिए कि रामचन्द्रजी वापस क्यों गये, यहाँ यह उल्लेख हुआ है कि वे उस विशेष स्थान को गये जहाँ भक्तियोगी जाते हैं। निर्विशेषवादी श्रीमद्भागवत के कथन से इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि इसका अर्थ यह है कि भगवान् अपने ही तेज में प्रविष्ट हुए; अतएव वे निराकार हो जाते हैं। किन्तु भगवान् तो पुरुष हैं और उनके भक्त भी पुरुष हैं। निस्सन्देह, सारे जीव भी भगवान् के समान भूतकाल में पुरुष थे, वर्तमान काल में भी पुरुष हैं और इस शरीर को त्यागने पर भी पुरुष बने रहेंगे। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में भी हुई है।

 
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