श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 11: भगवान् रामचन्द्र का विश्व पर राज्य करना  »  श्लोक 23

 
श्लोक
पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन् ।
आनृशंस्यपरो राजन् कर्मबन्धैर्विमुच्यते ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
पुरुष:—कोई व्यक्ति; राम-चरितम्—भगवान् रामचन्द्र के कार्यकलापों से सम्बन्धित कथा को; श्रवणै:—कानों से; उपधारयन्— श्रवण करके; आनृशंस्य-पर:—ईर्ष्या से पूरी तरह मुक्त हो जाता है; राजन्—हे राजा परीक्षित; कर्म-बन्धै:—कर्म के बन्धन से; विमुच्यते—मुक्त हो जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा परीक्षित, जो भी व्यक्ति भगवान् रामचन्द्र के गुणों से सम्बन्धित कथाओं को कानों से सुनता है वह अन्ततोगत्वा ईर्ष्या के रोग से मुक्त हो जायेगा और फलस्वरूप कर्मबन्धन से छूट जायेगा।
 
तात्पर्य
 इस जगत में हर व्यक्ति किसी न किसी से ईर्ष्या करता है। यहाँ तक कि धार्मिक जीवन में भी यदि कोई भक्त आध्यात्मिक कार्यों में आगे बढ़ चुका होता है तो अन्य भक्त उससे ईर्ष्या करने लगते हैं। ऐसा ईर्ष्यालु भक्त जन्म-मृत्यु के कारण से पूर्णतया मुक्त नहीं हो पाता। जब तक कोई जन्मन्मरण के बन्धन से पूर्णतया मुक्त नहीं ही जाता, तब तक वह सनातन धाम में प्रविष्ट नहीं हो सकता। देह की उपाधियों से प्रभावित होकर मनुष्य ईर्ष्यालु बनता है, किन्तु मुक्त भक्त को शरीर से कुछ भी लेना-देना नहीं रहता; अतएव वह दिव्य पद पर पूर्णतया स्थित रहता है। भक्त किसी से भी ईर्ष्या नहीं करता, यहाँ तक कि अपने शत्रु से भी नहीं।
चूँकि भक्त यह जानता है कि भगवान् उसके परम रक्षक हैं अतएव वह सोचता है, “तथाकथित शत्रु मेरा क्या बिगाड़ सकता है।” इस तरह भक्त अपनी सुरक्षा के बारे में आश्वस्त रहता है। भगवान् कहते हैं—ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्—जो जिस अनुपात में मेरी शरण में आता है उसी के अनुसार मैं उसकी रक्षा करता हूँ। अतएव भक्त को पूर्णतया ईर्ष्याविहीन होना चाहिए और विशेष रूप से अन्य भक्तों से। उन से ईष्या करना महान् अपराध है और यह वैष्णव अपराध कहलाता है। जो भक्त निरन्तर श्रवण-कीर्तन में लगा रहता है वह निश्चित रूप से ईर्ष्या-रोग से मुक्त हो जाता है और इस तरह भगवद्धाम जाने का पात्र बन जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥