श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 11: भगवान् रामचन्द्र का विश्व पर राज्य करना  »  श्लोक 9

 
श्लोक
नाहं बिभर्मि त्वां दुष्टामसतीं परवेश्मगाम् ।
स्त्रैणो हि बिभृयात् सीतां रामो नाहं भजे पुन: ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
न—न तो; अहम्—मैं; बिभर्मि—भार वहन कर सकता हूँ; त्वाम्—तुम्हारा; दुष्टाम्—दूषित होने के कारण; असतीम्—कुलटा; पर वेश्म-गाम्—दूसरे पुरुष के घर में जाकर और परपति-गमन करके; स्त्रैण:—पत्नीभक्त, मेहरा; हि—निस्सन्देह; बिभृयात्—स्वीकार कर सकता है; सीताम्—सीता को; राम:—रामचन्द्र जैसा; न—न; अहम्—मैं; भजे—स्वीकार करूँगा; पुन:—दुबारा ।.
 
अनुवाद
 
 (वह व्यक्ति अपनी कुलटा पत्नी से कह रहा था) तुम दूसरे व्यक्ति के घर जाती हो; अतएव तुम कुलटा तथा दूषित हो। अब मैं और अधिक तुम्हारा भार नहीं वहन कर सकता। भले ही रामचन्द्र जैसा स्त्रीभक्त पति सीता जैसी पत्नी को स्वीकार कर ले मैं उनकी तरह स्त्रीभक्त नहीं हूँ; अतएव मैं तुम्हें फिर से नहीं रख सकता।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥