श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 14: पुरुरवा का उर्वशी पर मोहित होना  »  श्लोक 22

 
श्लोक
घृतं मे वीर भक्ष्यं स्यान्नेक्षे त्वान्यत्र मैथुनात् ।
विवाससं तत् तथेति प्रतिपेदे महामना: ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
घृतम्—घी या अमृत; मे—मेरी; वीर—हे वीर पुरुष; भक्ष्यम्—खाद्य वस्तु; स्यात्—होगी; न—नहीं; ईक्षे—देखूँगी; त्वा—तुमको; अन्यत्र—किसी और समय; मैथुनात्—मैथुन काल के अतिरिक्त; विवाससम्—विवस्त्र, नग्न; तत्—वह; तथा इति—ऐसा ही हो; प्रतिपेदे—वचन दे दिया; महामना:—राजा पुरुरवा ने ।.
 
अनुवाद
 
 उर्वशी ने कहा, “हे वीर, मैं केवल घी की बनी वस्तुएँ खाऊँगी और आपको मैथुन-समय के अतिरिक्त अन्य किसी समय नग्न नहीं देखना चाहूँगी।” विशालहृदय पुरुरवा ने इन प्रस्तावों को स्वीकार कर लिया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥