श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 14: पुरुरवा का उर्वशी पर मोहित होना  »  श्लोक 46

 
श्लोक
तस्य निर्मन्थनाज्जातो जातवेदा विभावसु: ।
त्रय्या स विद्यया राज्ञा पुत्रत्वे कल्पितस्त्रिवृत् ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—पुरुरवा के; निर्मन्थनात्—मन्थन या घर्षण से; जात:—उत्पन्न हुआ; जात-वेदा:—वैदिक सिद्धान्तों के अनुसार भौतिक भोग के निमित्त; विभावसु:—अग्नि; त्रय्या—वैदिक सिद्धान्तों का पालन करते हुए; स:—अग्नि; विद्यया—ऐसी विधि से; राज्ञा—राजा द्वारा; पुत्रत्वे—पुत्र उत्पन्न होना; कल्पित:—ऐसा हुआ कि; त्रि-वृत्—तीन अक्षर ।.
 
अनुवाद
 
 पुरुरवा द्वारा अरणियों के रगडऩे से अग्नि उत्पन्न हुई। ऐसी अग्नि से मनुष्य को भौतिक भोग में पूर्ण सफलता मिल सकती है और वह सन्तान उत्पत्ति, दीक्षा तथा यज्ञ करते समय शुद्ध हो सकता है जिन्हें अ, उ, म् (ओम्) शब्दों के द्वारा आवाहन किया जा सकता है। इस प्रकार वह अग्नि राजा पुरुरवा का पुत्र मान ली गई।
 
तात्पर्य
 वैदिक विधि के अनुसार मनुष्य को वीर्य (शुक्र ) द्वारा पुत्र प्राप्ति हो सकती है, दीक्षा द्वारा (सावित्र ) प्रामाणिक शिष्य प्राप्त हो सकता है अथवा यज्ञ की अग्नि (यज्ञ ) द्वारा पुत्र या शिष्य प्राप्त हो सकता है। इस तरह जब महाराज पुरुरवा ने अरणियों के मन्थन से अग्नि उत्पन्न की
तो अग्नि उसका पुत्र बन गई। मनुष्य को वीर्य, दीक्षा अथवा यज्ञ द्वारा पुत्रलाभ हो सकता है। ओङ्कार या प्रणव वैदिक मंत्र में तीन अक्षर अ, उ, म् होते हैं जो इन तीनों विधियों का आवाहन कर सकते हैं। अतएव निर्मन्थनाज्जात: शब्द बतलाते हैं कि अरणियों के रगडऩे से पुत्र उत्पन्न हुआ।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥