श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 14: पुरुरवा का उर्वशी पर मोहित होना  »  श्लोक 47

 
श्लोक
तेनायजत यज्ञेशं भगवन्तमधोक्षजम् ।
उर्वशीलोकमन् विच्छन्सर्वदेवमयं हरिम् ॥ ४७ ॥
 
शब्दार्थ
तेन—ऐसी अग्नि उत्पन्न करने से; अयजत—पूजा की; यज्ञ-ईशम्—यज्ञ के स्वामी की; भगवन्तम्—भगवान्; अधोक्षजम्—इन्द्रियों की अनुभूति से परे; उर्वशी-लोकम्—वह लोक जहाँ उर्वशी रहती थी; अन्विच्छन्—जाना चाहते हुए; सर्व-देव-मयम्—सभी देवताओं का आगार; हरिम्—भगवान् को ।.
 
अनुवाद
 
 उर्वशी-लोक जाने के इच्छुक पुरुरवा ने उस अग्नि के द्वारा एक यज्ञ किया जिससे उसने यज्ञफल के भोक्ता भगवान् हरि को तुष्ट किया। इस प्रकार उसने इन्द्रियानुभूति से परे एवं समस्त देवताओं के आगार भगवान् की पूजा की।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में आया है—भोक्तांर यज्ञ तपसां सर्वलोकमहेश्वरम्—चाहे जिस लोक को भी जाने की इच्छा की जाय वह यज्ञ के भोक्ता भगवान् की सम्पत्ति है। यज्ञ का उद्देश्य भगवान् को तुष्ट करना है। इस युग में, जैसा हम ने कई बार बताया है भगवान् को तुष्ट करने के लिए एकमात्र यज्ञ हरे कृष्ण महामंत्र का संकीर्तन करना है। भगवान् के तुष्ट होने पर भौतिक या आध्यात्मिक कोई भी इच्छा पूरी की जा सकती है। भगवद्गीता (३.१४) का भी यह कथन है—यज्ञाद् भवति पर्जन्य:—भगवान् विष्णु को यज्ञ अर्पित करने से पर्याप्त वर्षा होती है। पर्याप्त वर्षा होने से भूमि से सब कुछ उत्पन्न हो सकता है (सर्वकाम दुघा मही )। तब भूमि का समुचित उपयोग हो सकता है, जिससे जीवन की सभी आवश्यकताएँ पूरी की जा सकती हैं—यथा अन्न, फल, फूल तथा तरकारियाँ। भौतिक सम्पत्ति की सारी वस्तुएँ भूमि से उत्पन्न होती हैं अतएव उसे सर्वकाम दुघा मही (भागवत
१.१०.४) कहा गया है। यज्ञ सम्पन्न करने पर सभी कुछ सम्भव है। अतएव पुरुरवा ने भौतिक वस्तु चाहकर भी भगवान् को प्रसन्न करने के लिए यथार्थ में यज्ञ सम्पन्न किया।भगवान् अधोक्षज हैं—वे पुरुरवा तथा अन्य सबों की अनुभूति के परे हैं। फलस्वरूप जीव को अपनी इच्छापूर्ति के लिए कोई न कोई यज्ञ करना ही होता है। मानव समाज में यज्ञ तभी सम्भव है जब समाज वर्णाश्रम धर्म द्वारा चार वर्णों तथा चार आश्रमों में बँटा हो। ऐसे विधान के बिना कोई यज्ञ नहीं कर सकता और यज्ञ सम्पन्न किये बिना चाहे कितनी योजनाएँ क्यों न बनाई जाएँ; मानव समाज कभी सुखी नहीं हो सकता। अतएव हर एक को यज्ञ सम्पन्न करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इस कलियुग में जिस यज्ञ की संस्तुति की जाती है वह संकीर्तन है, जो हरे कृष्ण महामंत्र का व्यक्तिगत या सामूहिक कीर्तन है। इससे मानव समाज की सारी आवश्यकताएँ पूरी हो सकेंगी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥