श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 15: भगवान् का योद्धा अवतार, परशुराम  »  श्लोक 10

 
श्लोक
तद् विदित्वा मुनि: प्राह पत्नीं कष्टमकारषी: ।
घोरो दण्डधर: पुत्रो भ्राता ते ब्रह्मवित्तम: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
तत्—यह तथ्य; विदित्वा—जानकर; मुनि:—मुनि ने; प्राह—कहा; पत्नीम्—अपनी पत्नी से; कष्टम्—अत्यन्त दुखद; अकारषी:— तुमने कर डाला; घोर:—भयानक; दण्ड-धर:—महापुरुष जो अन्यों को दण्ड दे सकता है; पुत्र:—ऐसा पुत्र; भ्राता—भाई; ते— तुम्हारा; ब्रह्म-वित्तम:—अध्यात्म विद्या में पंडित ।.
 
अनुवाद
 
 जब ऋषि ऋचीक स्नान करके घर लौटे और उन्हें यह पता लगा कि उनकी अनुपस्थिति में क्या घटना घटी है तो उन्होंने अपनी पत्नी सत्यवती से कहा, “तुमने बहुत बड़ी भूल की है। तुम्हारा पुत्र घोर क्षत्रिय होगा, जो हर एक को दण्ड दे सकेगा और तुम्हारा भाई अध्यात्म विद्या का पण्डित होगा।”
 
तात्पर्य
 वही ब्राह्मण योग्य कहलाता है जो अपनी इन्द्रियों तथा मन को वश में रख सकता हो, जो अध्यात्म विद्या का पण्डित हो और जो सहिष्णु तथा क्षमावान हो। किन्तु क्षत्रिय वही योग्य है जो अपराधियों को कड़ा से कड़ा दण्ड दे। भगवद्गीता (१८.४२-४३) में इन गुणों का उल्लेख है। चूँकि सत्यवती ने अपनी चरु न खाकर अपनी माता की चरु खा ली थी अतएव उससे जो पुत्र होगा वह क्षत्रिय गुणों से सम्पन्न होगा। यह अवांछनीय था। सामान्यतया ब्राह्मण का
पुत्र ब्राह्मण के गुणों वाला होना चाहिए, किन्तु यदि वह क्षत्रिय की भाँति खूँख्वार हो जाय तो उसका नामकरण भगवद्गीता में वर्णित चारों वर्णों के अनुसार होगा (चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागश: )। यदि ब्राह्मण का पुत्र ब्राह्मण-जैसा आचरण नहीं करता तो उसे उसकी योग्यता के अनुसार क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र कहा जायेगा। समाज को विभाजित करने का मूल सिद्धान्त मनुष्य का जन्म नहीं अपितु उसके गुण तथा कर्म हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥