श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 15: भगवान् का योद्धा अवतार, परशुराम  »  श्लोक 24

 
श्लोक
तस्मै स नरदेवाय मुनिरर्हणमाहरत् ।
ससैन्यामात्यवाहाय हविष्मत्या तपोधन: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मै—उस; स:—उस (जमदग्नि); नरदेवाय—राजा कार्तवीर्यार्जुन को; मुनि:—मुनि ने; अर्हणम्—पूजा की सामग्री; आहरत्— प्रदान की; स-सैन्य—सेना समेत उसको; अमात्य—उसके मंत्रियों को; वाहाय—तथा रथों, हाथियों, घोड़ों या पालकी वाहकों को; हविष्मत्या—कामधेनु रखने के कारण; तप:-धन:—मुनि, जिसकी तपस्या ही उसका धन था, अथवा जो तपस्या में लगा था ।.
 
अनुवाद
 
 जंगल में कठिन तपस्या में रत ऋषि जमदग्नि ने सैनिकों, मंत्रियों तथा पालकी वाहकों समेत राजा का अच्छी तरह स्वागत किया। उन्होंने इन अतिथियों को पूजा करने की सारी सामग्री जुटाई क्योंकि उनके पास कामधेनु गाय थी जो हर वस्तु प्रदान करने में सक्षम थी।
 
तात्पर्य
 ब्रह्म-संहिता से हमें जानकारी मिलती है कि वैकुण्ठ लोक, विशेष रूप से कृष्ण का निवासस्थल गोलोक वृन्दावन सुरभि गायों से पूर्ण है (सुरभीरभिपालयन्तम् )। सुरभि गाय को कामधेनु भी कहते हैं। यद्यपि जमदग्नि के पास एक ही कामधेनु थी, किन्तु वे उससे कोई भी इच्छित वस्तु प्राप्त कर सकते थे। इस तरह वे राजा के अनेक अनुचरों, मंत्रियों, सैनिकों, पशुओं तथा कहारों समेत राजा का स्वागत कर सके। जब हम राजा की बात करते हैं तो इसका अर्थ होता है कि उसके साथ अनेक अनुचर होंगे। जमदग्नि उस सबों का ठीक से स्वागत कर सके और उन्हें घी में बना पेट भर कर भोजन
खिला सके। राजा आश्चर्यचकित था कि जमदग्नि केवल एक गाय के होने से ही कितना ऐश्वर्यशाली है अतएव उसे इस ऋषि से ईर्ष्या होने लगी। उसके अपराध की यही शुरुआत है। भगवान् के अवतार परशुराम ने कार्तवीर्यार्जुन को मार डाला क्योंकि वह अत्यधिक घमंडी था। इस भौतिक जगत में किसी के पास कितना ही धन क्यों न हो, किन्तु यदि वह गर्वित होकर मनमाना कार्य करता है तो भगवान् उसे दण्ड देते हैं। इस कथा से यही शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए, जिसमें परशुराम ने कार्तवीर्यार्जुन पर क्रुद्ध होकर उसे मार डाला और फिर २१ बार सारे संसार को क्षत्रियविहीन कर दिया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥