श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 15: भगवान् का योद्धा अवतार, परशुराम  »  श्लोक 9

 
श्लोक
तावत् सत्यवती मात्रा स्वचरुं याचिता सती ।
श्रेष्ठं मत्वा तयायच्छन्मात्रे मातुरदत् स्वयम् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
तावत्—इसी बीच; सत्यवती—ऋचीक पत्नी सत्यवती; मात्रा—अपनी माता से; स्व-चरुम्—अपने लिए तैयार की गई चरु; याचिता—माँगे जाने पर; सती—होने से; श्रेष्ठम्—उत्तम; मत्वा—सोचकर; तया—उसके द्वारा; अयच्छत्—प्रदान किया गया; मात्रे— माता का; मातु:—माता का; अदत्—खाया; स्वयम्—स्वयं, खुद ।.
 
अनुवाद
 
 इसी बीच सत्यवती की माता ने सोचा कि उसकी पुत्री के लिए तैयार की गई चरु अवश्य ही श्रेष्ठ होगी अतएव उसने अपनी पुत्री से वह चरु माँग ली। सत्यवती ने वह चरु अपनी माता को दे दी और स्वयं अपनी माता की चरु खा ली।
 
तात्पर्य
 पति में अपनी पत्नी के लिए कुछ स्नेह होना स्वाभाविक है। अतएव सत्यवती की माता ने सोचा कि ऋषि ने सत्यवती के लिए जो चरु तैयार
की है वह अवश्य ही उसकी चरु से श्रेष्ठ होगी। फलत: ऋचीक की अनुपस्थिति में माता ने सत्यवती से श्रेष्ठ चरु लेकर खा ली।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥