श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 16: भगवान् परशुराम द्वारा विश्व के क्षत्रियों का विनाश  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
कालात्ययं तं विलोक्य मुने: शापविशङ्किता ।
आगत्य कलशं तस्थौ पुरोधाय कृताञ्जलि: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
काल-अत्ययम्—समय बिताते; तम्—उसको; विलोक्य—देखकर; मुने:—जमदग्नि के; शाप-विशङ्किता—शाप के भय से; आगत्य—लौटकर; कलशम्—जल के पात्र को; तस्थौ—खड़ी हो गई; पुरोधाय—मुनि के सामने रखकर; कृत-अञ्जलि:—हाथ जोडक़र ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् यह समझकर कि यज्ञ करने का समय बीत चुका है, रेणुका अपने पति द्वारा शापित होने से भयभीत हो उठी। अतएव जब वह लौटकर आई तो वह उनके समक्ष जलपात्र रखकर हाथ जोडक़र खड़ी हो गई।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥