श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 16: भगवान् परशुराम द्वारा विश्व के क्षत्रियों का विनाश  »  श्लोक 7

 
श्लोक
वरेणच्छन्दयामास प्रीत: सत्यवतीसुत: ।
वव्रे हतानां रामोऽपि जीवितं चास्मृतिं वधे ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
वरेण च्छन्दयाम् आस—इच्छानुसार वर माँगने के लिए कहा; प्रीत:—उससे प्रसन्न होकर; सत्यवती-सुत:—सत्यवती-पुत्र जमदग्नि ने; वव्रे—कहा; हतानाम्—मेरी मृत माता तथा भाई; राम:—परशुराम; अपि—भी; जीवितम्—उन्हें जीवित कर दें; च—भी; अस्मृतिम्—कोई स्मरण नहीं; वधे—मेरे द्वारा मारे हुओं का ।.
 
अनुवाद
 
 सत्यवती-पुत्र जमदग्नि परशुराम से अत्यधिक प्रसन्न हुए और उनसे इच्छानुसार वर माँगने के लिए कहा। परशुराम ने कहा, “मेरी माता तथा मेरे भाइयों को फिर से जीवित हो जाने दें और उन्हें यह स्मरण न रहे कि मैंने उन्हें मारा था। मैं आपसे इतना ही वर माँगता हूँ।”
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥