श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 16: भगवान् परशुराम द्वारा विश्व के क्षत्रियों का विनाश  »  श्लोक 9

 
श्लोक
येऽर्जुनस्य सुता राजन् स्मरन्त: स्वपितुर्वधम् ।
रामवीर्यपराभूता लेभिरे शर्म न क्‍वचित् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
ये—जो; अर्जुनस्य—कार्तवीर्यार्जुन के; सुता:—पुत्र; राजन्—हे महाराज परीक्षित; स्मरन्त:—सदैव स्मरण करते हुए; स्व-पितु: वधम्—(परशुराम द्वारा) अपने पिता के वध; राम-वीर्य-पराभूता:—भगवान् परशुराम की श्रेष्ठ शक्ति द्वारा पराजित; लेभिरे—प्राप्त किया; शर्म—सुख; न—नहीं; क्वचित्—कभी ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा परीक्षित, परशुराम की श्रेष्ठ शक्ति द्वारा पराजित कार्तवीर्यार्जुन के पुत्रों को कभी सुख नहीं मिल पाया क्योंकि उन्हें अपने पिता का वध सदैव याद आता रहा।
 
तात्पर्य
 जमदग्नि सचमुच अपनी तपस्या के कारण अत्यन्त शक्तिशाली थे, किन्तु अपनी पत्नी रेणुका के थोड़े से अपराध के लिए उन्होंने उसके वध किये जाने का आदेश दे डाला। यह निश्चय ही पापपूर्ण कृत्य था; अतएव कार्तवीर्यार्जुन के पुत्रों ने जमदग्नि को मार डाला, जैसा कि यहाँ पर बतलाया गया है। भगवान् परशुराम को
भी कार्तवीर्यार्जुन के वध का थोड़ा पाप लगा, किन्तु यह इतना बड़ा पाप न था। अतएव चाहे कोई कार्तवीर्यार्जुन हो, भगवान् परशुराम हो, जमदग्नि हो या अन्य कोई, उसे सावधानी तथा बुद्धिमत्ता से कर्म करना चाहिए अन्यथा उसे पापकृत्यों का फल भुगतना पड़ता है। वैदिक साहित्य से हमें यही शिक्षा मिलती है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥