श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 18: राजा ययाति को यौवन की पुन:प्राप्ति  »  श्लोक 15

 
श्लोक
एवं क्षिपन्तीं शर्मिष्ठा गुरुपुत्रीमभाषत ।
रुषा श्वसन्त्युरङ्गीव धर्षिता दष्टदच्छदा ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; क्षिपन्तीम्—अपमानित की गई; शर्मिष्ठा—वृषपर्वा की पुत्री ने; गुरु-पुत्रीम्—गुरु शुक्राचार्य की पुत्री से; अभाषत—कहा; रुषा—क्रुद्ध हाने से; श्वसन्ती—गहरी साँस लेती; उरङ्गी इव—सर्पिणी की तरह; धर्षिता—कुचली हुई, अपमानित; दष्ट-दत्-छदा—अपने दाँतों से अपने होठ चबाती ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : शर्मिष्ठा को जब इस तरह कठोर शब्दों से डाँटा गया तो वह अत्यधिक क्रुद्ध हो उठी। सर्पिणी की तरह गहरी साँस छोड़ती और अपने निचले होठ को अपने दाँतों से चबाती वह शुक्राचार्य की पुत्री से इस तरह बोली।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥