श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 18: राजा ययाति को यौवन की पुन:प्राप्ति  »  श्लोक 27

 
श्लोक
क्षणार्धमन्युर्भगवान् शिष्यं व्याचष्ट भार्गव: ।
कामोऽस्या: क्रियतां राजन् नैनां त्यक्तुमिहोत्सहे ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
क्षण-अर्ध—कुछ ही क्षण; मन्यु:—क्रोध; भगवान्—अत्यन्त शक्तिशाली; शिष्यम्—अपने शिष्य वृषपर्वा से; व्याचष्ट—कहा; भार्गव:—भृगुवंशी शुक्राचार्य से; काम:—इच्छा; अस्या:—इस देवयानी की; क्रियताम्—पूरी करो; राजन्—हे राजा; न—नहीं; एनाम्—इस लडक़ी को; त्यक्तुम्—त्यागने के लिए; इह—इस संसार में; उत्सहे—समर्थ हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 शक्तिशाली शुक्राचार्य कुछ क्षणों तक क्रुद्ध रहे, किन्तु प्रसन्न हो जाने पर उन्होंने वृषपर्वा से कहा: हे राजन, देवयानी की इच्छा पूरी कीजिये क्योंकि वह मेरी पुत्री है और मैं इस संसार में न तो उसे छोड़ सकता हूँ न उसकी उपेक्षा कर सकता हूँ।
 
तात्पर्य
 कभी-कभी शुक्राचार्य जैसा महापुरुष अपने पुत्र-पुत्रियों की अवहेलना नहीं कर सकता क्योंकि पुत्र-पुत्रियाँ स्वभावत: पिता पर आश्रित रहती हैं और पिता का उन पर स्नेह होता है। यद्यपि शुक्राचार्य जानते थे कि देवयानी तथा शर्मिष्ठा का झगड़ा बचकाना है लेकिन देवयानी के पिता के
रूप में उन्हें अपनी पुत्री का पक्ष लेना पड़ रहा था। यद्यपि वे ऐसा करना नहीं चाहते थे, किन्तु स्नेहवश विवश थे। उन्होंने यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि उन्हें राजा की कृपा की याचना नहीं करनी चाहिए थी, किन्तु पुत्री-स्नेह के कारण वे ऐसा करने से अपने को बचा नहीं पाये।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥