श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 18: राजा ययाति को यौवन की पुन:प्राप्ति  »  श्लोक 5

 
श्लोक
श्रीराजोवाच
ब्रह्मर्षिर्भगवान् काव्य: क्षत्रबन्धुश्च नाहुष: ।
राजन्यविप्रयो: कस्माद् विवाह: प्रतिलोमक: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-राजा उवाच—महाराज परीक्षित ने जिज्ञासा की; ब्रह्म-ऋषि:—ब्राह्मणों में श्रेष्ठ; भगवान्—अत्यन्त शक्तिशाली; काव्य:— शुक्राचार्य; क्षत्र-बन्धु:—क्षत्रिय जाति से सम्बन्धित; च—भी; नाहुष:—राजा ययाति; राजन्य-विप्रयो:—ब्राह्मण तथा क्षत्रिय का; कस्मात्—कैसे; विवाह:—विवाह; प्रतिलोमक:—प्रथा के विपरीत ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज परीक्षित ने कहा : शुक्राचार्य अत्यन्त शक्तिशाली ब्राह्मण थे और महाराज ययाति क्षत्रिय थे। अतएव मैं यह जानने का इच्छुक हूँ कि ब्राह्मण तथा क्षत्रिय के बीच यह प्रतिलोम विवाह कैसे सम्पन्न हुआ?
 
तात्पर्य
 वैदिक पद्धति के अनुसार परस्पर क्षत्रियों में या परस्पर ब्राह्मणों में विवाह होना सर्वसामान्य प्रथा है। यदि कभी विभिन्न वर्णों के बीच विवाह होते हैं तो ये दो प्रकार के होते हैं—अनुलोम तथा प्रतिलोम। एक ब्राह्मण तथा क्षत्रियपुत्री के मध्य विवाह की अनुमति है। यह अनुलोम है, किन्तु
एक क्षत्रिय तथा ब्राह्मणपुत्री के मध्य विवाह प्रतिलोम है और सामान्यतया इसकी अनुमति नहीं है। इसीलिए महाराज परीक्षित जानने को उत्सुक थे कि शुक्राचार्य जैसे शक्तिशाली ब्राह्मण ने प्रतिलोम विवाह किस प्रकार स्वीकार किया। वे इस असामान्य विवाह के कारण को जानने के लिए उत्सुक थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥