श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 19: राजा ययाति को मुक्ति-लाभ  »  श्लोक 12

 
श्लोक
तथाहं कृपण: सुभ्रु भवत्या: प्रेमयन्त्रित: ।
आत्मानं नाभिजानामि मोहितस्तव मायया ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
तथा—बकरे की तरह; अहम्—मैं; कृपण:—कंजूस, जिसे जीवन के महत्त्व का कोई ज्ञान नहीं है; सु-भ्रु—हे सुन्दर भौहों वाली; भवत्या:—तुम्हारे साथ; प्रेम-यन्त्रित:—मानों प्रेम में बँधा हूँ जो कि वास्तव में विषयवासना है; आत्मानम्—आत्मसाक्षात्कार (जो मैं हूँ और जो मेरा धर्म है); न अभिजानामि—अभी तक समझ नहीं पाया; मोहित:—मोहित होकर; तव—तुम्हारे; मायया—आकर्षक भौतिक स्वरूप के द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 हे सुन्दर भौहों वाली प्रिये, मैं उसी बकरे के सदृश हूँ क्योंकि मैं इतना मन्दबुद्धि हूँ कि मैं तुम्हारे सौन्दर्य से मोहित होकर आत्म-साक्षात्कार के असली कार्य को भूल गया हूँ।
 
तात्पर्य
 यदि कोई अपनी पत्नी के तथाकथित सौन्दर्य में फँसा रहता है तो उसका गृहस्थ-जीवन अन्धकूप के तुल्य है। हित्वात्मपातं गृहमन्धकूपम्। ऐसे अन्धकूप में रहना निश्चित रूप से आत्मघात है। यदि कोई दयनीय भौतिक जीवन से छुटकारा चाहता है तो उसे स्वेच्छापूर्वक अपनी पत्नी के साथ अपने विषय भोगों को त्यागना होगा अन्यथा आत्म-साक्षात्कार का प्रश्न ही नहीं उठता। जब
तक कोई आध्यात्मिक चेतना में बहुत आगे न बढ़ा-चढ़ा हो तब तक गृहस्थ जीवन अन्धकूप के सिवा कुछ भी नहीं है जिसमें उसे आत्मघात करना होता है। इसीलिए महाराज प्रह्लाद ने संस्तुति की है कि यथासमय, कम से कम जब मनुष्य पचास वर्ष का हो जाय तो उसे घरबार छोडक़र वन में चले जाना चाहिए। वनं गतो यद्धरिम् आश्रयेत। वहाँ उसे हरि के चरणकमलों की शरण ग्रहण करनी चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥