श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 19: राजा ययाति को मुक्ति-लाभ  »  श्लोक 13

 
श्लोक
यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशव: स्त्रिय: ।
न दुह्यन्ति मन:प्रीतिं पुंस: कामहतस्य ते ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जो भी; पृथिव्याम्—इस संसार के भीतर; व्रीहि—अन्न, धान; यवम्—जौ; हिरण्यम्—सोना; पशव:—पशु; स्त्रिय:—स्त्रियाँ, पत्नियाँ; न दुह्यन्ति—नहीं देती हैं; मन:-प्रीतिम्—मन की तुष्टि; पुंस:—पुरुष को; काम-हतस्य—विषयवासनाओं के शिकार होने के कारण; ते—वे ।.
 
अनुवाद
 
 कामी पुरुष का मन कभी तुष्ट नहीं होता भले ही उसे इस संसार की हर वस्तु प्रचुर मात्रा में उपलब्ध क्यों न हो, जैसेकि धान, जौ, अन्य अनाज, सोना, पशु तथा स्त्रियाँ इत्यादि। उसे किसी वस्तु से संतोष नहीं होता।
 
तात्पर्य
 भौतिकतावादी का लक्ष्य अपनी आर्थिक दशा को सुधारना है, किन्तु इस आर्थिक विकास का कोई अन्त नहीं है क्योंकि यदि मनुष्य अपनी कामेच्छाओं को वश में नहीं करता तो वह कभी भी सन्तुष्ट नहीं होगा, भले ही उसे विश्व भर की सम्पत्ति क्यों न मिल जाये। इस युग में हमें पर्याप्त भौतिक विकास दिखता है तो भी लोग अधिकाधिक भौतिक ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए संघर्षरत हैं। मन: षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति। यद्यपि प्रत्येक जीव परम पुरुष का अंश है, किन्तु कामेच्छाओं के कारण वह अपनी तथाकथित आर्थिक दशा को सुधारने के नाम पर निरन्तर संघर्षशील रहता है। मनस्तुष्टि प्राप्त करने के लिए कामेच्छाओं के मनो-रोग को त्यागना होगा। यह तभी हो सकता है जब कोई कृष्णभावनाभावित हो।
भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीर: (भागवत १०.३३.३९) कृष्णभावनाभावित होने पर मनोरोग जाता रहता है अन्यथा कामेच्छाओं का यह रोग चलता रहेगा और मनुष्य को कभी भी मन:शान्ति प्राप्त नहीं हो सकेगी।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥