श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 19: राजा ययाति को मुक्ति-लाभ  »  श्लोक 15

 
श्लोक
यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेष्वमङ्गलम् ।
समद‍ृष्टेस्तदा पुंस: सर्वा: सुखमया दिश: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
यदा—जब; न—नहीं; कुरुते—करता है; भावम्—अनुरक्ति या द्वेष से भिन्न मनोवृत्ति; सर्व-भूतेषु—सारे जीवों पर; अमङ्गलम्— अशुभ; सम-दृष्टे:—समदृष्टि होने से; तदा—उस समय, तब; पुंस:—पुरुष का; सर्वा:—सारी; सुख-मया:—सुखी अवस्था में; दिश:—दिशाएँ ।.
 
अनुवाद
 
 जब मनुष्य द्वेष-रहित होता है और किसी का बुरा नहीं चाहता तो वह समदर्शी होता है। ऐसे व्यक्ति के लिए सारी दिशाएँ सुखमय प्रतीत होती हैं।
 
तात्पर्य
 प्रबोधानन्द सरस्वती ने कहा है—विश्वं पूर्णसुखायते—जब मनुष्य भगवान् चैतन्य के अनुग्रह से कृष्णभावनाभावित बनता है तो उसे सारा संसार सुखी दिखता है और उसे किसी वस्तु की लालसा नहीं रह जाती। ब्रह्म-भूत अवस्था में या दिव्य-साक्षात्कार के पद पर न कोई संताप रहता है न कोई भौतिक आकांक्षा। (न शोचति न कांक्षति ) जब तक मनुष्य इस जगत में रहता है तब तक कर्म-फल चलते रहते हैं, किन्तु जब मनुष्य कर्म तथा फल से अप्रभावित
हो जाता है तो वह भौतिक इच्छाओं का शिकार बनने के खतरे से बच जाता है। इस श्लोक में उन लोगों के लक्षणों का वर्णन हुआ है जो कामेच्छाओं से ऊब गए हैं। जैसा कि श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने बतलाया है जब मनुष्य अपने शत्रु से भी द्वेष नहीं रखता, जब वह किसी से सम्मान नहीं चाहता, उल्टे वह अपने शत्रु तक का भला चाहता है तो वह परमहंस कहा जाता है अर्थात् जिसने अपनी कामवासनाओं को पूरी तरह दमित कर लिया है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥