श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 19: राजा ययाति को मुक्ति-लाभ  »  श्लोक 23

 
श्लोक
भूमण्डलस्य सर्वस्य पूरुमर्हत्तमं विशाम् ।
अभिषिच्याग्रजांस्तस्य वशे स्थाप्य वनं ययौ ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
भू-मण्डलस्य—सारे पृथ्वीलोक का; सर्वस्य—सारी सम्पत्ति का; पूरुम्—अपने सब से छोटे पुत्र पूरु को; अर्हत्-तमम्—सर्वाधिक पूज्य व्यक्ति, राजा; विशाम्—प्रजा का; अभिषिच्य—अभिषेक करके; अग्रजान्—यदु से लेकर अपने बड़े भाइयों को; तस्य—पूरु के; वशे—नियंत्रण में; स्थाप्य—रखकर; वनम्—वन; ययौ—चला गया ।.
 
अनुवाद
 
 ययाति ने अपने सबसे छोटे पुत्र पूरु को सारे विश्व का सम्राट तथा सारी सम्पत्ति का स्वामी बना दिया और पूरु से बड़े अपने अन्य सारे पुत्रों को पूरु के अधीन कर दिया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥