श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 19: राजा ययाति को मुक्ति-लाभ  »  श्लोक 8

 
श्लोक
तं दुर्हृदं सुहृद्रूपं कामिनं क्षणसौहृदम् ।
इन्द्रियाराममुत्सृज्य स्वामिनं दु:खिता ययौ ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उस (बकरे) को; दुर्हृदम्—अत्यन्त क्रूर हृदय; सुहृत्-रूपम्—मित्र बनने वाले; कामिनम्—अत्यन्त कामी; क्षण-सौहृदम्—क्षण भर की मित्रता; इन्द्रिय-आरामम्—केवल इन्द्रियतृप्ति या विलासिता में रुचि रखने वाला; उत्सृज्य—छोडक़र; स्वामिनम्—अपने इस पति को या अपने पूर्व पालक को; दु:खिता—अत्यन्त दुखी; ययौ—वह चली गई ।.
 
अनुवाद
 
 अन्य बकरी के साथ अपने पति के इस आचरण से दुखी उस बकरी ने सोचा कि यह बकरा उसका वास्तविक मित्र नहीं अपितु कठोरहृदय वाला तथा कुछ क्षण के लिए ही मित्र है। अतएव अपने पति के कामी होने के कारण उस बकरी ने उसका साथ छोड़ दिया और अपने पहले वाले स्वामी के पास लौट गई।
 
तात्पर्य
 स्वामिनम् शब्द महत्त्वपूर्ण है । स्वामी का अर्थ है रखवाली करने वाला अथवा पति। देवयानी का पालन विवाह के पूर्व शुक्राचार्य द्वारा हो रहा था और विवाह के बाद ययाति द्वारा, किन्तु यहाँ पर स्वामिनम् शब्द बताता है कि देवयानी ने अपने पति ययाति का संरक्षण त्याग दिया और वह अपने पहले वाले
रक्षक शुक्राचार्य के यहाँ लौट गई। वैदिक सभ्यता की संस्तुति है कि स्त्री पुरुष के संरक्षण में रहे। बचपन में उसकी रक्षा पिता द्वारा की जानी चाहिए, युवावस्था में उसके पति द्वारा और बुढ़ापे में वयस्क पुत्र द्वारा।किसी भी अवस्था में स्त्री को स्वतंत्रता नहीं दी जानी चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥