श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 19: राजा ययाति को मुक्ति-लाभ  »  श्लोक 9

 
श्लोक
सोऽपि चानुगत: स्त्रैण: कृपणस्तां प्रसादितुम् ।
कुर्वन्निडविडाकारं नाशक्नोत् पथि सन्धितुम् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह बकरा; अपि—भी; च—भी; अनुगत:—बकरी का पीछा करता; स्त्रैण:—स्त्री-प्रेमी; कृपण:—अत्यन्त गरीब; ताम्— उसको; प्रसादितुम्—प्रसन्न करने के लिए; कुर्वन्—करते हुए; इडविडा-कारम्—बकरी की भाषा में बोलते हुए; न—नहीं; अशक्नोत्—समर्थ था; पथि—मार्ग में; सन्धितुम्—प्रसन्न करने के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 वह बकरा अत्यन्त दुखी होकर अपनी पत्नी का चाटुकार होने के कारण मार्ग में उसके पीछे पीछे हो लिया और उसने उसकी भरसक चाटुकारी करनी चाही, किन्तु वह उसे मना नहीं पाया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥