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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 2: मनु के पुत्रों की वंशावलियाँ  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  9.2.10 
एवं शप्तस्तु गुरुणा प्रत्यगृह्णात् कृताञ्जलि: ।
अधारयद् व्रतं वीर ऊर्ध्वरेता मुनिप्रियम् ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; शप्त:—शापित होकर; तु—लेकिन; गुरुणा—अपने गुरु द्वारा; प्रत्यगृह्णात्—उसने स्वीकार कर लिया; कृत- अञ्जलि:—हाथ जोडक़र; अधारयत्—ग्रहण किया; व्रतम्—ब्रह्मचर्य व्रत; वीर:—उस वीर ने; ऊर्ध्व-रेता:—अपनी इन्द्रियों को वश में करके; मुनि-प्रियम्—मुनियों द्वारा स्वीकृत ।.
 
अनुवाद
 
 जब उस वीर पृषध्र को उसके गुरु ने इस प्रकार शाप दे दिया तो उसने हाथ जोडक़र वह शाप अंगीकार कर लिया। तत्पश्चात् अपनी इन्द्रियों को वश में करते हुए उसने सभी मुनियों द्वारा सम्मत ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया।
 
 
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