श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 2: मनु के पुत्रों की वंशावलियाँ  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक
एकां जग्राह बलवान् सा चुक्रोश भयातुरा ।
तस्यास्तु क्रन्दितं श्रुत्वा पृषध्रोऽनुससार ह ॥ ५ ॥
खड्‌गमादाय तरसा प्रलीनोडुगणे निशि ।
अजानन्नच्छिनोद् बभ्रो: शिर: शार्दूलशङ्कया ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
एकाम्—एक गाय को; जग्राह—पकड़ लिया; बलवान्—बलशाली बाघ ने; सा—वह गाय; चुक्रोश—चिल्लाने लगी; भय- आतुरा—भयभीत; तस्या:—उसकी; तु—लेकिन; क्रन्दितम्—चीत्कार; श्रुत्वा—सुनकर; पृषध्र:—पृषध्र ने; अनुससार ह—पीछा किया; खड्गम्—तलवार; आदाय—लेकर; तरसा—तेजी से; प्रलीन-उडु-गणे—जब तारे बादलों से ढक गये; निशि—रात में; अजानन्—अनजाने; अच्छिनोत्—काट लिया; बभ्रो:—गाय का; शिर:—सिर; शार्दूल-शङ्कया—बाघ का सिर समझकर ।.
 
अनुवाद
 
 जब अत्यन्त बलवान बाघ ने एक गाय को पकड़ लिया तो वह भयभीत होकर चिल्लाने लगी। पृषध्र ने यह चीत्कार सुनी और वह तुरन्त इस आवाज का पीछा करने लगा। उसने अपनी तलवार निकाल ली लेकिन चूँकि तारे बादलों से ढके थे अतएव उसने गाय को बाघ समझकर धोखे में अत्यन्त बलपूर्वक गाय का सिर काट लिया।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥