श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 20: पूरु का वंश  »  श्लोक 8-9

 
श्लोक
दुष्मन्तो मृगयां यात: कण्वाश्रमपदं गत: ।
तत्रासीनां स्वप्रभया मण्डयन्तीं रमामिव ॥ ८ ॥
विलोक्य सद्यो मुमुहे देवमायामिव स्त्रियम् ।
बभाषे तां वरारोहां भटै: कतिपयैर्वृत: ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
दुष्मन्त:—महाराज दुष्मन्त; मृगयाम् यात:—शिकार करने के लिए गया हुआ; कण्व-आश्रम-पदम्—कण्व के आश्रम में; गत:— आया; तत्र—वहाँ; आसीनाम्—बैठी हुई; स्व-प्रभया—अपने सौन्दर्य से; मण्डयन्तीम्—प्रकाशित करती हुई; रमाम् इव—लक्ष्मी जी की तरह; विलोक्य—देखकर; सद्य:—तुरन्त; मुमुहे—मोहित हो गया; देव-मायाम् इव—भगवान् की माया के सदृश; स्त्रियम्—सुन्दर स्त्री को; बभाषे—सम्बोधित किया; ताम्—उसको; वर-आरोहाम्—सुन्दर स्त्रियों में सर्वश्रेष्ठ; भटै:—सैनिकों द्वारा; कतिपयै:—कुछ; वृत:—घिरा हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 एक बार जब राजा दुष्मन्त शिकार करने जंगल गया और अत्यधिक थक गया तो वह महाराज कण्व के आश्रम में जा पहुँचा। वहाँ उसने एक अत्यन्त सुन्दर स्त्री देखी जो लक्ष्मी जी के समान लग रही थी और वहाँ अपने तेज से सारे आश्रम को प्रकाशित करती हुई बैठी थी। स्वभावत: राजा उसके सौन्दर्य से आकृष्ट हो गया अतएव वह अपने कुछ सैनिकों के साथ उसके पास गया और उससे बोला।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥