श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 21: भरत का वंश  »  श्लोक 11

 
श्लोक
तस्य तां करुणां वाचं निशम्य विपुलश्रमाम् ।
कृपया भृशसन्तप्त इदमाहामृतं वच: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उसका (चण्डाल) का; ताम्—उन; करुणाम्—दयनीय; वाचम्—शब्दों को; निशम्य—सुनकर; विपुल—अत्यधिक; श्रमाम्—थका हुआ; कृपया—दया करके; भृश-सन्तप्त:—अत्यन्त दुखी; इदम्—ये सब; आह—बोला; अमृतम्—मधुर; वच:— शब्द ।.
 
अनुवाद
 
 बेचारे थके चण्डाल के दयनीय वचनों को सुनकर दुखित महाराज रन्तिदेव ने इस प्रकार के अमृततुल्य वचन कहे।
 
तात्पर्य
 महाराज रन्तिदेव के शब्द अमृततुल्य थे; अतएव दुखी व्यक्ति की शारीरिक सेवा
करने के अतिरिक्त वे अपनी वाणी से ही सुनने वाले के जीवन को बचा सकते थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥