श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 21: भरत का वंश  »  श्लोक 12

 
श्लोक
न कामयेऽहं गतिमीश्वरात् परा-
मष्टर्द्धियुक्तामपुनर्भवं वा ।
आर्तिं प्रपद्येऽखिलदेहभाजा-
मन्त:स्थितो येन भवन्त्यदु:खा: ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
न कामये—नहीं चाहता; अहम्—मैं; गतिम्—गन्तव्य; ईश्वरात्—भगवान् से; पराम्—महान; अष्ट-ऋद्धि-युक्ताम्—आठ प्रकार की सिद्धियों से रचित; अपुन:-भवम्—बारम्बार जन्म का अन्त (मोक्ष); वा—अथवा; आर्तिम्—कष्ट; प्रपद्ये—स्वीकार करता हूँ; अखिल-देह-भाजाम्—सारे जीवों के; अन्त:-स्थित:—भीतर स्थित; येन—जिससे; भवन्ति—होते हैं; अदु:खा:—दुखरहित ।.
 
अनुवाद
 
 मैं ईश्वर से न तो योग की अष्ट सिद्धियों के लिए प्रार्थना करता हूँ न जन्म-मृत्यु के चक्र से मोक्ष की कामना करता हूँ। मैं सारे जीवों के बीच निवास करके उनके लिए सारे कष्टों को भोगना चाहता हूँ जिससे वे कष्ट से मुक्त हो सकें।
 
तात्पर्य
 वासुदेव दत्त ने भी श्रीचैतन्य महाप्रभु से इसी प्रकार प्रार्थना की थी कि वे अपनी उपस्थिति में सारे जीवों को मुक्त कर दें। उसने कहा कि यदि ये जीव मुक्त होने लायक न हों तो वह उन सबों के पापफलों को अपने ऊपर
ले सकता है और स्वयं कष्ट भोग सकता है जिससे भगवान् उन सबका उद्धार कर सकें। इसीलिए वैष्णव को परदुखदुखी कहा गया है। इस तरह वैष्णव व्यक्ति मानव समाज के वास्तविक कल्याण-कार्यों में अपने आपको लगाता है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥