श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 21: भरत का वंश  »  श्लोक 21

 
श्लोक
अजमीढो द्विमीढश्च पुरुमीढश्च हस्तिन: ।
अजमीढस्य वंश्या: स्यु: प्रियमेधादयो द्विजा: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
अजमीढ:—अजमीढ; द्विमीढ:—द्विमीढ; च—भी; पुरुमीढ:—पुरुमीढ; च—भी; हस्तिन:—हस्ती के पुत्र बने; अजमीढस्य— अजमीढ के; वंश्या:—वंशज; स्यु:—हैं; प्रियमेध-आदय:—प्रियमेध इत्यादि; द्विजा:—ब्राह्मण ।.
 
अनुवाद
 
 राजा हस्ती के तीन पुत्र हुए—अजमीढ, द्विमीढ, तथा पुरुमीढ। अजमीढ के वंशजों में प्रियमेध प्रमुख था और उन सबों ने ब्राह्मण पद प्राप्त किया।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में ऐसा प्रमाण मिलता है जो भगवद्गीता के इस कथन की पुष्टि करता है कि समाज के वर्ण—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—गुणों तथा कर्मों के आधार पर परिगणित होते हैं (गुणकर्मविभागश: )। क्षत्रिय वर्ण के अजमीढ के सभी वंशज ब्राह्मण बन गये। ऐसा उनके गुणों तथा कर्मों के आधार पर हुआ। इसी प्रकार कभी-कभी ब्राह्मण या क्षत्रिय के पुत्र वैश्य बन जाते हैं (ब्राह्मणा वैश्यतां गता: )। जब क्षत्रिय
या ब्राह्मण वैश्य के व्यवसाय या कर्म को ग्रहण करता है (कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यम् ) तो वह निश्चित रूप से वैश्य गिना जाता है। दूसरी ओर वैश्य कुल में उत्पन्न व्यक्ति अपने व्यवसाय से ब्राह्मण बन सकता है। इसकी पुष्टि नारद मुनि ने की है। यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तम्। विविध वर्णों के सदस्यों की पुष्टि उनके लक्षणों से की जानी चाहिए, जन्म से नहीं। जन्म महत्त्वपूर्ण नहीं, गुण आवश्यक है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥