श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 22: अजमीढ के वंशज  »  श्लोक 44-45

 
श्लोक
दण्डपाणिर्निमिस्तस्य क्षेमको भविता यत: ।
ब्रह्मक्षत्रस्य वै योनिर्वंशो देवर्षिसत्कृत: ॥ ४४ ॥
क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थां प्राप्स्यति वै कलौ ।
अथ मागधराजानो भाविनो ये वदामि ते ॥ ४५ ॥
 
शब्दार्थ
दण्डपाणि:—दण्डपाणि; निमि:—निमि; तस्य—उसका (महीनर के); क्षेमक:—क्षेमक; भविता—जन्म लेगा; यत:—जिससे; ब्रह्म क्षत्रस्य—ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों का; वै—निस्सन्देह; योनि:—स्रोत; वंश:—वंश; देव-ऋषि-सत्कृत:—ऋषियों तथा देवताओं द्वारा सम्मानित; क्षेमकम्—राजा क्षेमक को; प्राप्य—यहाँ तक; राजानम्—राजा को; संस्थाम्—उन तक; प्राप्स्यति—हो जायेगा; वै— निस्सन्देह; कलौ—इस कलियुग में; अथ—तत्पश्चात्; मागध-राजान:—मागध वंशी राजा; भाविन:—भावी; ये—जो; वदामि— कहूँगा; ते—तुमसे ।.
 
अनुवाद
 
 महीनर का पुत्र दण्डपाणि होगा और उसका पुत्र निमि होगा जिससे राजा क्षेमक की उत्पत्ति होगी। मैंने अभी तुमसे सोमवंश का वर्णन किया है जो ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों का उद्गम है और देवताओं तथा ऋषियों-मुनियों द्वारा पूजित है। इस कलियुग में क्षेमक अन्तिम राजा होगा। अब मैं तुमसे मागध वंश का भविष्य बतलाऊँगा। उसे सुनो।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥