श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 23: ययाति के पुत्रों की वंशावली  »  श्लोक 20-21

 
श्लोक
यत्रावतीर्णो भगवान् परमात्मा नराकृति: ।
यदो: सहस्रजित्क्रोष्टा नलो रिपुरिति श्रुता: ॥ २० ॥
चत्वार: सूनवस्तत्र शतजित् प्रथमात्मज: ।
महाहयो रेणुहयो हैहयश्चेति तत्सुता: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
यत्र—जिस वंश में; अवतीर्ण:—अवतार लिया; भगवान्—भगवान् कृष्ण; परमात्मा—सारे जीवों के परमात्मा; नर-आकृति:—मनुष्य के रूप में; यदो:—यदु का; सहस्रजित्—सहस्रजित; क्रोष्टा—क्रोष्टा; नल:—नल; रिपु:—रिपु; इति श्रुता:—इस प्रकार से विख्यात; चत्वार:—चारों; सूनव:—पुत्र; तत्र—वहाँ; शतजित्—शतजित; प्रथम-आत्मज:—पहला पुत्र; महाहय:—महाहय; रेणुहय:—रेणुहय; हैहय:—हैहय; च—तथा; इति—इस प्रकार; तत्-सुता:—उसके पुत्र ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् कृष्ण, जो सारे जीवों के हृदयों में परमात्मा स्वरूप हैं, मनुष्य के अपने आदि रूप में यदु कुल में अवतरित हुए। यदु के चार पुत्र थे—सहस्रजित्, क्रोष्टा, नल तथा रिपु। इन चारों में से सबसे बड़े सहस्रजित के एक पुत्र था जिसका नाम शतजित था। उसके तीन पुत्र हुए—महाहय, रेणुहय तथा हैहय।
 
तात्पर्य
 जैसा कि श्रीमद्भागवत (१.२.११) में पुष्टि हुई है—
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।

ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥

“विद्वान आध्यात्मवादी जो परम सत्य को जानते हैं, इस अद्वय ज्ञान को ब्रह्म, परमात्मा या भगवान् कहते हैं।” अधिकांश आध्यात्मवादी केवल निराकार ब्रह्म या अन्तर्यामी परमात्मा को समझते हैं क्योंकि भगवान् को समझ पाना अत्यन्त कठिन है। भगवान् ने भगवद्गीता (७.३) में कहा है— मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।

यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत: ॥

“हजारों व्यक्तियों में से कोई एक व्यक्ति सिद्धि के लिए प्रयास करता है और जिन्होंने सिद्धि पा ली है उनमें से मुश्किल से एक मुझे जानता है।” योगी तथा ज्ञानी अर्थात् मायावादी और निर्विशेषवादी परम सत्य को निराकार या अन्तर्यामी रूप में समझ सकते हैं और ऐसे स्वरूपसिद्ध व्यक्ति यद्यपि सामान्य पुरुषों से बढक़र होते हैं फिर भी वे यह नहीं समझ सकते कि परमेश्वर किस तरह एक व्यक्ति हो सकता है। इसीलिए कहा गया है कि अनेक सिद्धों में से जिन्होंने परम सत्य का साक्षात्कार किया है कोई एक सिद्ध नर-रूप (नराकृति ) कृष्ण को समझ सकता है। स्वयं कृष्ण ने इस मनुष्य रूप की व्याख्या विराट रूप प्रदर्शित करने के बाद की है। विराट रूप भगवान् का आदि रूप नहीं है। उनका आदि रूप तो द्विभुज श्यामसुन्दर मुरलीधर का है जो दो हाथों वाले हैं और मुरली बजा रहे हैं (यं श्यामसुन्दरम् अचिन्त्यगुणस्वरूपम् )। भगवान् के स्वरूप उनके अकल्पनीय गुणों के प्रमाण हैं। यद्यपि भगवान् अपने एक श्वास काल में असंख्य ब्रह्माण्डों का पालन करते हैं, किन्तु वे मनुष्य की भाँति वेश धारण किये रहते हैं। किन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वे हू-बहू मनुष्य हैं। यह उनका आदि रूप है लेकिन चूँकि वे मनुष्य की तरह दिखते हैं अतएव अल्पज्ञानी उन्हें सामान्य मनुष्य मानते हैं। भगवान् कहते हैं (भगवद्गीता ९.११) अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।

परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥

“जब मैं मनुष्य रूप में अवतरित होता हूँ तो मूर्ख मेरा उपहास करते हैं। वे मेरी दिव्य प्रकृति एवं मेरे परम ईश्वरत्व को नहीं जानते।” भगवान् अपने परं भावम् अर्थात् दिव्य स्वभाव से सारे जीवों के हृदयों में स्थित सर्वव्यापी परमात्मा हैं; फिर भी वे मनुष्य की तरह लगते हैं। मायावादी दर्शन कहता है कि भगवान् मूलत: निराकार हैं, किन्तु जब वे अवतरित होते हैं तो मनुष्य तथा अनेक अन्य रूप धारण करते हैं। किन्तु वस्तुत: वे मूलत: मनुष्य जैसे हैं और निराकार ब्रह्म उनके शरीर की किरणों से युक्त होता है (यस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्डकोटि )।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥