श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 23: ययाति के पुत्रों की वंशावली  »  श्लोक 35-36

 
श्लोक
ज्यामघस्त्वप्रजोऽप्यन्यां भार्यां शैब्यापतिर्भयात् ।
नाविन्दच्छत्रुभवनाद् भोज्यां कन्यामहारषीत् ।
रथस्थां तां निरीक्ष्याह शैब्या पतिममर्षिता ॥ ३५ ॥
केयं कुहक मत्स्थानं रथमारोपितेति वै ।
स्‍नुषा तवेत्यभिहिते स्मयन्ती पतिमब्रवीत् ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
ज्यामघ:—ज्यामघ; तु—निस्सन्देह; अप्रज: अपि—यद्यपि नि:सन्तान; अन्याम्—दूसरी; भार्याम्—पत्नी; शैब्या-पति:—शैब्या का पति होने के कारण; भयात्—भय से; न अविन्दत्—स्वीकार नहीं किया; शत्रु-भवनात्—शत्रु के खेमे से; भोज्याम्—वेश्या को; कन्याम्—कन्या; अहारषीत्—ले आया; रथ-स्थाम्—रथ में बैठी; ताम्—उसको; निरीक्ष्य—देखकर; आह—कहा; शैब्या—ज्यामघ की पत्नी शैब्या ने; पतिम्—पति पर; अमर्षिता—अत्यन्त क्रुद्ध; का इयम्—यह कौन है; कुहक—अरे धूर्त; मत्-स्थानम्—मेरा स्थान; रथम्—रथ पर; आरोपिता—बैठने के लिए अनुमति प्राप्त; इति—इस प्रकार; वै—निस्सन्देह; स्नुषा—बहू; तव—तुम्हारी; इति—इस प्रकार; अभिहिते—सूचित किये जाने पर; स्मयन्ती—हँसती हुई; पतिम्—पति से; अब्रवीत्—बोली ।.
 
अनुवाद
 
 ज्यामघ के कोई पुत्र न था, किन्तु क्योंकि वह अपनी पत्नी शैब्या से डरता था अतएव उसने दूसरा विवाह नहीं किया। एक बार ज्यामघ किसी शत्रु राजा के खेमे से एक लडक़ी ले आया जो एक वेश्या थी। किन्तु उसे देखकर शैब्या अत्यन्त क्रुद्ध हुई और उसने अपने पति से कहा “क्यों रे धूर्त! यह लडक़ी कौन है जो रथ में मेरे आसन पर बैठी है?” तब ज्यामघ ने उत्तर दिया “यह लडक़ी तुम्हारी बहू (पुत्रवधू) होगी।” इन विनोदपूर्ण शब्दों को सुनकर शैब्या ने हँसते हुए उत्तर दिया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥