श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 24: भगवान् श्रीकृष्ण  »  श्लोक 28-31

 
श्लोक
तस्यां स जनयामास दश पुत्रानकल्मषान् ।
वसुदेवं देवभागं देवश्रवसमानकम् ॥ २८ ॥
सृञ्जयं श्यामकं कङ्कं शमीकं वत्सकं वृकम् ।
देवदुन्दुभयो नेदुरानका यस्य जन्मनि ॥ २९ ॥
वसुदेवं हरे: स्थानं वदन्त्यानकदुन्दुभिम् ।
पृथा च श्रुतदेवा च श्रुतकीर्ति: श्रुतश्रवा: ॥ ३० ॥
राजाधिदेवी चैतेषां भगिन्य: पञ्च कन्यका: ।
कुन्ते: सख्यु: पिता शूरो ह्यपुत्रस्य पृथामदात् ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
तस्याम्—उससे (मारिषा) से; स:—उस (शूर) ने; जनयाम् आस—उत्पन्न किया; दश—दस; पुत्रान्—पुत्रों को; अकल्मषान्— निष्कलंक; वसुदेवम्—वसुदेव को; देवभागम्—देवभाग को; देवश्रवसम्—देवश्रवा को; आनकम्—आनक को; सृञ्जयम्—सृञ्जय को; श्यामकम्—श्यामक; कङ्कम्—कंक; शमीकम्—शमीक; वत्सकम्—वत्सक; वृकम्—वृक को; देव-दुन्दुभय:—देवताओं द्वारा दुन्दुभियाँ; नेदु:—बजाई गईं; आनका:—एक प्रकार की दुन्दुभी; यस्य—जिसके; जन्मनि—जन्म होने पर; वसुदेवम्—वसुदेव को; हरे:—भगवान् का; स्थानम्—स्थान; वदन्ति—लोग कहते हैं; आनकदुन्दुभिम्—आनक-दुन्दुभि; पृथा—पृथा; च—तथा; श्रुतदेवा—श्रुतदेवा; च—भी; श्रुतकीर्ति:—श्रुतकीर्ति; श्रुतश्रवा:—श्रुतश्रवा; राजाधिदेवी—राजाधिदेवी; च—भी; एतेषाम्—इन सबों की; भगिन्य:—बहनें; पञ्च—पाँच; कन्यका:—शूर की पुत्रियाँ; कुन्ते:—कुन्ति का; सख्यु:—मित्र; पिता—पिता; शूर:—शूर; हि—निस्सन्देह; अपुत्रस्य—पुत्रविहीन; पृथाम्—पृथा को; अदात्—दे दिया ।.
 
अनुवाद
 
 राजा शूर को अपनी पत्नी मारिषा से वसुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, सृञ्जय, श्यामक, कंक, शमीक, वत्सक तथा वृक नामक दस पुत्र उत्पन्न हुए। ये विशुद्ध पवित्र पुरुष थे। जब वसुदेव का जन्म हुआ था तो देवताओं ने स्वर्ग से दुन्दुभियां बजाई थीं। इसीलिए वसुदेव का नाम आनक- दुन्दुभि पड़ गया। इन्होंने भगवान् कृष्ण के प्राकट्य के लिए समुचित स्थान प्रदान किया। शूर के पाँच कन्याएँ भी जन्मीं, जिनके नाम थे पृथा, श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा तथा राजाधिदेवी। ये वसुदेव की बहनें थीं। शूर ने अपने मित्र कुन्ति को अपनी पुत्री पृथा दे दी क्योंकि उसके कोई सन्तान नहीं थी; इसलिए पृथा का दूसरा नाम कुन्ती था।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥