श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 24: भगवान् श्रीकृष्ण  »  श्लोक 32

 
श्लोक
साप दुर्वाससो विद्यां देवहूतीं प्रतोषितात् ।
तस्या वीर्यपरीक्षार्थमाजुहाव रविं शुचि: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
सा—उसने (पृथा ने); आप—प्राप्त किया; दुर्वासस:—दुर्वासा मुनि से; विद्याम्—योगशक्ति; देव-हूतीम्—किसी भी देवता का आवाहन करने की; प्रतोषितात्—प्रसन्न होकर; तस्या:—उस (योगशक्ति) से; वीर्य—प्रभाव; परीक्ष-अर्थम्—परीक्षा करने के लिए; आजुहाव—आवाहित किया; रविम्—सूर्यदेव को; शुचि:—पवित्र (पृथा) ।.
 
अनुवाद
 
 एक बार जब दुर्वासा पृथा के पिता कुन्ति के घर पर अतिथि बने तो पृथा ने अपनी सेवा से उन्हें प्रसन्न कर लिया। अतएव उसे ऐसी योगशक्ति प्राप्त हुई जिससे वह किसी भी देवता का आवाहन कर सकती थी। पवित्र कुन्ती ने इस योगशक्ति के प्रभाव की परीक्षा करने के लिए तुरन्त ही सूर्यदेव का आवाहन किया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥