श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 24: भगवान् श्रीकृष्ण  »  श्लोक 56

 
श्लोक
यदा यदा हि धर्मस्य क्षयो वृद्धिश्च पाप्मन: ।
तदा तु भगवानीश आत्मानं सृजते हरि: ॥ ५६ ॥
 
शब्दार्थ
यदा—जब; यदा—जब; हि—निस्सन्देह; धर्मस्य—धर्म की; क्षय:—हानि; वृद्धि:—बढ़ोतरी; च—तथा; पाप्मन:—पापकृत्यों की; तदा—तब; तु—निस्सन्देह; भगवान्—भगवान्; ईश:—परम नियन्ता; आत्मानम्—साक्षात्, स्वयं; सृजते—अवतरित होते हैं; हरि:— भगवान् हरि ।.
 
अनुवाद
 
 जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब परम नियन्ता भगवान् श्री हरि स्वेच्छा से प्रकट होते हैं।
 
तात्पर्य
 जिन नियमों से भगवान् इस धरा पर अवतरित होते हैं उनकी व्याख्या इस श्लोक में हुई है। इन्हीं नियमों की व्याख्या स्वयं भगवान् ने भगवद्गीता (४.७) में भी की है—
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

“हे भारत! जब जब और जहाँ जहाँ धर्म का ह्रास होता है और अधर्म का प्राधान्य होता है तब तब मैं अवतार ग्रहण करता हूँ।”

वर्तमान युग में श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में हरे कृष्ण आन्दोलन का सूत्रपात करने के लिए भगवान् प्रकट हुए हैं। वर्तमान समय में, कलियुग में लोग अत्यन्त पापी तथा मन्द-बुद्धि हैं। उन्हें आध्यात्मिक जीवन का कोई ज्ञान नहीं है और वे मानव रूप के लाभों का दुरुपयोग कुत्तों-बिल्लियों की तरह जीवन बिताने में कर रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में श्रीचैतन्य महाप्रभु ने हरे कृष्ण आन्दोलन का सूत्रपात किया जो कृष्ण से अभिन्न है। यदि कोई इस आन्दोलन से सम्बन्ध जोड़ता है तो वह भगवान् के सान्निध्य में आता है। लोगों को हरे कृष्ण मंत्र कीर्तन का लाभ उठाना चाहिए और इस कलियुग में उत्पन्न सारी समस्याओं से छुटकारा पाना चाहिए।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥