श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 24: भगवान् श्रीकृष्ण  »  श्लोक 58

 
श्लोक
यन्मायाचेष्टितं पुंस: स्थित्युत्पत्त्यप्ययाय हि ।
अनुग्रहस्तन्निवृत्तेरात्मलाभाय चेष्यते ॥ ५८ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जो भी; माया-चेष्टितम्—भगवान् द्वारा बनाये गये प्रकृति के नियम; पुंस:—जीवों की; स्थिति—जीवन अवधि; उत्पत्ति—जन्म; अप्ययाय—संहार के लिए; हि—निस्सन्देह; अनुग्रह:—कृपा; तत्-निवृत्ते:—जन्म-मृत्यु के चक्र को रोकने के लिए विराट शक्ति की सृष्टि तथा प्राकट्य; आत्म-लाभाय—भगवद्धाम जाने के लिए; च—निस्सन्देह; इष्यते—इसी उद्देश्य से सृष्टि हुई है ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् अपनी माया के माध्यम से इस विराट जगत के सृजन, पालन तथा संहार का कार्य करते हैं जिससे वे अपनी दया से जीव का उद्धार कर सकें और जीव के जन्म, मृत्यु तथा भौतिक जीवन की अवधि को रोक सकें। इस तरह वे जीव को भगवद्धाम लौटने में सक्षम बनाते हैं।
 
तात्पर्य
 भौतिकतावादी लोग कभी-कभी पूछते हैं कि ईश्वर ने जीवों के कष्ट के लिए भौतिक जगत की सृष्टि क्यों की? भौतिक सृष्टि निश्चय ही उन बद्धजीवों को कष्ट पहुँचाने के लिए है जो भगवान् के अंश स्वरूप हैं जैसा कि भगवान् ने स्वयं भगवद्गीता (१५.७) में पुष्टि की है—
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।

मन: षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥

“इस बद्ध जगत में जीव मेरे नित्य अंश हैं। बद्ध जीवन के कारण वे मन समेत छहों इन्द्रियों से कठिन संघर्ष कर रहे हैं।” सारे जीव भगवान् के अंश रूप हैं और गुणात्मक रूप से भगवान् के ही समान हैं, किन्तु मात्रात्मक रूप से उनमें महान् अन्तर है क्योंकि भगवान् असीम हैं और जीव सीमित है। इस प्रकार भगवान् में असीम ह्लादिनी शक्ति होती है, किन्तु जीव में यह सीमित होती है। आनन्दमयोऽभ्यासात् (वेदान्त सूत्र १.१.१२)। भगवान् तथा जीव दोनों ही गुणात्मक दृष्टि से आत्मा होने के कारण शान्तिपूर्ण भोग करना चाहते हैं, किन्तु जब भगवान् का अंश दुर्भाग्यवश स्वतंत्र रूप से कृष्ण के बिना भोग करना चाहता है तो उसे भौतिक जगत में डाल दिया जाता है जहाँ वह अपना जीवन ब्रह्मा से प्रारम्भ करके धीरे-धीरे एक चींटी या मल के कीट के पद तक उतार दिया जाता है। यही मन: षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति है। जीवन के लिए महान् संघर्ष चलता है क्योंकि माया द्वारा बद्ध किया गया जीव पूरी तरह प्रकृति के वश में रहता है (प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै कर्माणि सर्वश: )। मनुष्य अपने सीमित ज्ञान के कारण सोचता है कि वह इस भौतिक जगत में भोग कर रहा है। मन: षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति। वास्तव में वह प्रकृति के पूर्ण वशीभूत रहता है; फिर भी वह अपने को स्वतंत्र मानता है (अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते )। जब वह चिन्तनपरक ज्ञान के द्वारा ऊपर उठकर ब्रह्म से तदाकार होना चाहता है तो भी यही रोग चलता रहता है। आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं तत: पतन्त्यध: (भागवत १०.२.३२)। उस परं पदम् को प्राप्त करके तथा निर्विशेष ब्रह्म में तल्लीन होकर भी वह पुन: भौतिक जगत में आ गिरता है।

इस तरह बद्धजीव इस जीवन के लिए इस जगत में महान् संघर्ष करता है; अतएव भगवान् उस पर अनुग्रह के कारण इस जगत में प्रकट होते हैं और उसे शिक्षा देते हैं। इस प्रकार भगवान् भगवद्गीता (४.७) में कहते हैं—

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

“हे भारत! जब-जब धर्म का ह्रास होता है और अधर्म का प्राधान्य होता है तब-तब मैं स्वयं अवतरित होता हूँ।” असली धर्म कृष्ण की शरण ग्रहण करना है लेकिन विद्रोही जीव, कृष्ण की शरण न ग्रहण करके, कृष्ण जैसा बनने के लिए संघर्ष के दौरान अधर्म में लग जाता है। अतएव कृष्ण अनुग्रहवश जीव को अपनी असली स्थिति समझने के लिए अवसर प्रदान करने हेतु इस सृष्टि की रचना करते हैं। भगवद्गीता तथा ऐसे ही वैदिक ग्रंथ इसीलिए भेंट किये जाते हैं कि जीव कृष्ण से अपने सम्बन्ध को समझ सके। वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्य: (भगवद्गीता १५.१५)। ये सारे वैदिक ग्रंथ मनुष्य को यह समझाने के लिए हैं कि वह क्या है, उसकी असली स्थिति क्या है और भगवान् से उसका क्या सम्बन्ध है। यही ब्रह्मजिज्ञासा है। हर बद्ध आत्मा संघर्षरत है, किन्तु मानव जीवन उसे सबसे अच्छा अवसर प्रदान करता है कि वह अपनी स्थिति को समझे। इसीलिए इस श्लोक में अनुग्रहस्तन्निवृत्ते: कहा गया है जो सूचित करता है कि जन्म-मृत्यु के चक्र के मिथ्या जीवन को समाप्त हो जाना चाहिए और बद्ध आत्मा को शिक्षा दी जानी चाहिए। सृष्टि का यही प्रयोजन है।

जैसा कि नास्तिक सोचते हैं यह सृष्टि मनमाने ढंग से नहीं उत्पन्न हुई—

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।

अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम् ॥

“उनका कहना है कि यह जगत असत्य है, इसका कोई आधार नहीं है तथा इसका नियंत्रण करने वाला कोई ईश्वर नहीं है। यह तो कामेच्छा से उत्पन्न होता है और कामवासना के अतिरिक्त इसका कोई अन्य कारण नहीं है।” (भगवद्गीता १६.८)। नास्तिक धूर्त सोचते हैं कि ईश्वर नहीं है और यह सृष्टि वैसे ही (संयोगवश) बन गई है जिस तरह स्त्री तथा पुरुष का मिलन संयोग की बात होती है और तब स्त्री गर्भवती हो जाती है और शिशु को जन्म देती है। लेकिन वास्तव में यह तथ्य नहीं है। तथ्य तो यह है कि इस सृष्टि के पीछे एक प्रयोजन है—वह है बद्धजीव को उसकी मूल चेतना, कृष्णभावनामृत, तक लौटने का अवसर प्रदान करना जिससे वह भगवद्धाम वापस जाकर आध्यात्मिक जगत में पूर्णतया सुखी रह सके। इस जगत में बद्धजीव को अपनी इन्द्रियों को तुष्ट करने का अवसर प्रदान किया जाता है, किन्तु साथ ही उसे वैदिक ज्ञान द्वारा सावधान किया जाता है कि यह भौतिक संसार उसके सुख का असली स्थान नहीं है। जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खदोषानुदर्शनम् (भगवद्गीता १३.९)। मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र को बन्द करना होगा। अतएव हर मनुष्य को चाहिए कि इस सृष्टि में आकर कृष्ण को तथा कृष्ण से अपने सम्बन्ध को समझे और इस तरह भगवद्धाम को वापस जाए।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥