श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 3: सुकन्या तथा च्यवन मुनि का विवाह  »  श्लोक 11

 
श्लोक
कस्यचित् त्वथ कालस्य नासत्यावाश्रमागतौ ।
तौ पूजयित्वा प्रोवाच वयो मे दत्तमीश्वरौ ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
कस्यचित्—कुछ (समय) बाद; तु—लेकिन; अथ—इस प्रकार; कालस्य—समय के बीतने पर; नासत्यौ—दोनों अश्विनीकुमार; आश्रम—च्यवन मुनि के स्थान पर; आगतौ—पहुँचे; तौ—उन दोनों को; पूजयित्वा—सत्कार तथा नमस्कार करके; प्रोवाच—कहा; वय:—तारुण्य; मे—मुझको; दत्तम्—कृपा करके दे दो; ईश्वरौ—क्योंकि तुम दोनों ऐसा करने में समर्थ हो ।.
 
अनुवाद
 
 कुछ काल बीतने के बाद दोनों अश्विनीकुमार जो स्वर्गलोक के वैद्य थे, च्यवन मुनि के आश्रम आये। उनका सत्कार करने के बाद च्यवन मुनि ने उनसे यौवन प्रदान करने के लिए प्रार्थना की क्योंकि वे ऐसा करने में सक्षम थे।
 
तात्पर्य
 अश्विनीकुमार जैसे स्वर्ग के वैद्य किसी को भी, चाहे वह वृद्ध क्यों न हो, जवानी दे सकते थे। निस्सन्देह, बड़े-बड़े योगी अपनी योगशक्ति से शव में भी जीवन फूँक सकते हैं यदि शरीर की संरचना बिगड़ी न हो। शुक्राचार्य द्वारा बलि महाराज के सैनिकों के उपचार के प्रसंग में हम इसकी व्याख्या कर चुके हैं। यद्यपि आधुनिक चिकित्साशास्त्र शव को जीवित करने या वृद्ध शरीर में जवानी लाने में असमर्थ है, किन्तु इस श्लोकों से पता चलता है कि यदि कोई वैदिक शास्त्र
से ज्ञान प्राप्त कर ले तो ऐसा उपचार सम्भव है। दोनों अश्विनीकुमार धन्वन्तरि के ही समान आयुर्वेद में पटु थे। यदि भौतिक विज्ञान की प्रत्येक शाखा में पूर्णता प्राप्त की जानी है तो इसे प्राप्त करने के लिए वैदिक साहित्य का अवलोकन करना चाहिए। किन्तु सबसे बड़ी पूर्णता (सिद्धि) तो भगवान् का भक्त बनना है। इस पूर्णता-प्राप्ति के लिए श्रीमद्भागवत का अवलोकन करना चाहिए जो वैदिक कल्पतरु का पक्व फल माना जाता है (निगमकल्पतरोर्गलितं फलम् )।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥