श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 3: सुकन्या तथा च्यवन मुनि का विवाह  »  श्लोक 13

 
श्लोक
बाढमित्यूचतुर्विप्रमभिनन्द्य भिषक्तमौ ।
निमज्जतां भवानस्मिन् ह्रदे सिद्धविनिर्मिते ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
बाढम्—हाँ, हम ऐसा करेंगे; इति—इस प्रकार; ऊचतु:—दोनों ने उत्तर दिया, च्यवन मुनि का प्रस्ताव स्वीकार किया; विप्रम्— ब्राह्मण (च्यवन मुनि) को; अभिनन्द्य—बधाई देकर; भिषक्-तमौ—दोनों महान् वैद्य अश्विनीकुमार; निमज्जताम्—डुबकी लगाइये; भवान्—आप; अस्मिन्—इस; ह्रदे—झील में; सिद्ध-विनिर्मिते—सभी प्रकार की सिद्धियों के लिए विशेषत: बनाई गई ।.
 
अनुवाद
 
 उन महान् वैद्य अश्विनीकुमारों ने च्यवन मुनि के प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। उन्होंने उस ब्राह्मण से कहा “आप इस सिद्धिदायक झील में गोता लगाइये। (जो इस झील में नहाता है उसकी कामनाएँ पूरी होती हैं)।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥