श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 3: सुकन्या तथा च्यवन मुनि का विवाह  »  श्लोक 14

 
श्लोक
इत्युक्तो जरया ग्रस्तदेहो धमनिसन्तत: ।
ह्रदं प्रवेशितोऽश्विभ्यां वलीपलितविग्रह: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
इति उक्त:—इस प्रकार कहे जाने पर; जरया—वृद्धावस्था तथा अशक्तता के कारण; ग्रस्त-देह:—रुग्ण देह; धमनि-सन्तत:—जिसकी धमनियाँ शरीर भर में झलक रही थीं; ह्रदम्—झील में; प्रवेशित:—प्रविष्ट हुए; अश्विभ्याम्—अश्विनीकुमारों की सहायता से; वली पलित-विग्रह:—जिसके शरीर की चमड़ी झूल रही थी तथा बाल सफेद थे ।.
 
अनुवाद
 
 यह कहकर अश्विनीकुमारों ने च्यवन मुनि को पकड़ा जो वृद्ध थे और जिनके रुग्ण शरीर की चमड़ी झूल रही थी, बाल सफेद थे तथा सारे शरीर में नसें दिख रही थीं और वे तीनों उस झील में घुस गये।
 
तात्पर्य
 च्यवन मुनि इतने वृद्ध थे कि वे अकेले झील में नहीं घुस सकते थे। अत:
अश्विनीकुमारों ने उनका शरीर पकड़ा और वे तीनों झील में घुस गये।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥