श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 3: सुकन्या तथा च्यवन मुनि का विवाह  »  श्लोक 20

 
श्लोक
चिकीर्षितं ते किमिदं पतिस्त्वया
प्रलम्भितो लोकनमस्कृतो मुनि: ।
यत् त्वं जराग्रस्तमसत्यसम्मतं
विहाय जारं भजसेऽमुमध्वगम् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
चिकीर्षितम्—तुम जो करना चाहती हो; ते—तुम्हारा; किम् इदम्—यह क्या है; पति:—अपना पति; त्वया—तुम्हारे द्वारा; प्रलम्भित:—ठगा गया है; लोक-नमस्कृत:—जिसका सभी लोग आदर करते हैं; मुनि:—महान् साधु; यत्—क्योंकि; त्वम्—तुम; जरा-ग्रस्तम्—अत्यन्त वृद्ध एवं अशक्त; असति—हे दुष्ट लडक़ी; असम्मतम्—अनाकर्षक; विहाय—छोडक़र; जारम्—परपति, धृष्ट; भजसे—स्वीकार किया है; अमुम्—इस व्यक्ति को; अध्वगम्—जो भिखारी के तुल्य है ।.
 
अनुवाद
 
 हे दुष्ट लडक़ी, तुमने यह क्या कर दिया? तुमने अपने अत्यन्त सम्माननीय पति को धोखा दिया है क्योंकि मैं देख रहा हूँ कि उसके वृद्ध, रोगग्रस्त तथा अनाकर्षक होने के कारण तुमने उसका साथ छोडक़र इस तरुण पुरुष को अपना पति बनाना चाहा है जो भिक्षुक जैसा प्रतीत होता है।
 
तात्पर्य
 इससे वैदिक संस्कृति की महत्ता झलकती है। परिस्थितिवश सुकन्या को ऐसा पति दिया गया था जो उसकी तुलना में वृद्ध था। चूँकि च्यवन मुनि रुग्ण एवं अति वृद्ध थे अतएव वे निश्चित रूप से राजा शर्याति की सुन्दर पुत्री के अनुरूप न थे। फिर भी उसके पिता चाहते थे कि वह अपने पति की आज्ञाकारिणी बनी रहे। अतएव जब पिता ने सहसा देखा कि उसकी पुत्री ने किसी अन्य को पति बना लिया है, यद्यपि वह तरुण तथा सुन्दर था तो भी उसने तुरन्त ही उसे असती कहकर दुत्कारा क्योंकि उसने यह कल्पना कर ली कि उसकी पुत्री ने अपने पति
के रहते किसी अन्य को पति बना लिया है। वैदिक संस्कृति के अनुसार यदि कोई तरुणी किसी वृद्ध को भी ब्याह दी जाय तो उसे आदरपूर्वक उसकी सेवा करनी चाहिए। यही सतीत्व है। ऐसा नहीं है कि यदि वह अपने पति को नहीं चाहती तो उसे छोड़ दे और दूसरा पति कर ले। यह वैदिक संस्कृति के विरुद्ध है। वैदिक संस्कृति के अनुसार माता-पिता द्वारा कन्या जिसको सौंप दी जाती है उसे ही पति मानकर उसे उसकी आज्ञाकारिणी बनना और सती रहना होता है। इसीलिए राजा शर्याति सुकन्या के बगल में एक तरुण पुरुष को देखकर चकित हो गए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥