श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 3: सुकन्या तथा च्यवन मुनि का विवाह  »  श्लोक 3

 
श्लोक
सा सखीभि: परिवृता विचिन्वन्त्यङ्‌घ्रिपान् वने ।
वल्मीकरन्ध्रे दद‍ृशे खद्योते इव ज्योतिषी ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
सा—वह सुकन्या; सखीभि:—अपनी सहेलियों से; परिवृता—घिरी हुई; विचिन्वन्ती—चुनती हुई; अङ्घ्रिपान्—वृक्षों से फल तथा फूल; वने—जंगल में; वल्मीक-रन्ध्रे—बाँबी के छेद में; ददृशे—देखा; खद्योते—दो जुगुनू; इव—सदृश; ज्योतिषी—दो चमकीली वस्तुएँ ।.
 
अनुवाद
 
 जब वह सुकन्या जंगल में अपनी सहेलियों से घिरी हुई, वृक्षों से विविध प्रकार के फल एकत्र कर रही थी तो उसने बाँबी के छेद में दो जुगुनू जैसी चमकीली वस्तुएँ देखीं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥