श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 3: सुकन्या तथा च्यवन मुनि का विवाह  »  श्लोक 34

 
श्लोक
भुवो भारावताराय भगवान् भूतभावन: ।
अवतीर्णो निजांशेन पुण्यश्रवणकीर्तन: ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
भुव:—जगत का; भार-अवताराय—भार कम करने के लिए; भगवान्—भगवान्; भूत-भावन:—सारे जीवों के नित्य हितैषी; अवतीर्ण:—अवतरित हुए हैं; निज-अंशेन—अपने अंशस्वरूप समस्त साज-सामान सहित; पुण्य-श्रवण-कीर्तन:—उनकी पूजा श्रवण तथा कीर्तन से की जाती है जिससे मनुष्य पवित्र हो जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 बलदेवजी भगवान् हैं। जो कोई उनका श्रवण और उनका कीर्तन करता है वह पवित्र हो जाता है। चूँकि वे समस्त जीवों के सतत हितैषी हैं अतएव वे अपने सारे साज-सामान सहित सारे जगत को शुद्ध करने तथा इसका भार कम करने के लिए अवतरित हुए हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥