श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 3: सुकन्या तथा च्यवन मुनि का विवाह  »  श्लोक 8

 
श्लोक
दुहितुस्तद् वच: श्रुत्वा शर्यातिर्जातसाध्वस: ।
मुनिं प्रसादयामास वल्मीकान्तर्हितं शनै: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
दुहितु:—अपनी पुत्री का; तत् वच:—वह कथन; श्रुत्वा—सुनकर; शर्याति:—राजा शर्याति ने; जात-साध्वस:—भयभीत होकर; मुनिम्—च्यवन मुनि को; प्रसादयाम् आस—शांत करने का प्रयास किया; वल्मीक-अन्तर्हितम्—बाँबी के भीतर बैठे; शनै:—धीरे धीरे ।.
 
अनुवाद
 
 अपनी पुत्री से यह सुनकर राजा शर्याति अत्यधिक डर गये। उन्होंने अनेक प्रकार से च्यवन मुनि को शांत करने का प्रयत्न किया क्योंकि वे ही उस बाँबी के छेद के भीतर बैठे थे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥