श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 3: सुकन्या तथा च्यवन मुनि का विवाह  »  श्लोक 9

 
श्लोक
तदभिप्रायमाज्ञाय प्रादाद् दुहितरं मुने: ।
कृच्छ्रान्मुक्तस्तमामन्‍त्र्य पुरं प्रायात् समाहित: ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—च्यवन मुनि का; अभिप्रायम्—प्रयोजन; आज्ञाय—समझकर; प्रादात्—प्रदान कर दिया; दुहितरम्—अपनी पुत्री; मुने:—च्यवन मुनि को; कृच्छ्रात्—बड़ी कठिनाई से; मुक्त:—मुक्त बनाया; तम्—मुनि को; आमन्त्र्य—अनुमति लेकर; पुरम्—अपने स्थान को; प्रायात्—चला गया; समाहित:—अत्यधिक विचारमग्न ।.
 
अनुवाद
 
 अत्यन्त विचारमग्न होकर और च्यवन मुनि के प्रयोजन को समझकर राजा शर्याति ने मुनि को अपनी कन्या दान में दे दी। इस प्रकार बड़ी मुश्किल से संकट से मुक्त होकर उसने च्यवन मुनि से अनुमति ली और वह घर लौट गया।
 
तात्पर्य
 राजा ने अपनी लडक़ी से सारी बातें सुनकर च्यवन मुनि को यह अवश्य बतलाया होगा कि किस तरह उसकी पुत्री ने अनजाने ऐसा अपराध किया। किन्तु मुनि ने राजा से पूछा कि उसकी पुत्री विवाहिता है या
नहीं। इस तरह राजा ने मुनि का अभिप्राय समझकर (तदभिप्रायम् आज्ञाय ), तुरन्त ही अपनी पुत्री को दान में दे दिया और वह शापित होने के संकट से बच गया। तब मुनि की आज्ञा से राजा घर लौट गया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥